अहंकार और आग्रह पर्याय हैं| अहंकार है तो आग्रह होगा ही और आग्रह अहंकार के होने का सूचक है| अहंकार स्थिति है और आग्रह गति है| स्थिति और गति से मेरा मतलब है, अहंकार एक तरह का बल है आग्रह के मूल में| बल स्थिति है और उसके होने के कारणवश जो घटना देखने में आती है वह गति है| हमें जो अक्सर दिखाई पड़ती है वह गति ही है| गति के आधार पर हम स्थिति के होने का अनुमान लगाते हैं| जैसे ग्रेविटेशन (दो वस्तुओं के बीच आकर्षण) स्थिति है और उसके कारण उनमें अपनी जगह से हिलना गति है| हर गति के मूल में कोई न कोई स्थिति होगी ही| स्थिति और गति को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता|
यहाँ पर मूल वस्तु समझने की अहंकार ही है| अक्सर हम अपने आग्रहों के आधार पर अपने अहंकार के आकार को पहचानते हैं| अहंकार के आकार को एकांत में समझ पाना अत्यंत ही कठिन है| एकांत में अहंकार के होने का अनुमान लगाया जा सकता है पर उसके आकार को समझ पाना अत्यंत ही कठिन है| हर व्यक्ति के अहंकार का आकार अपना अलग अलग होता है| देखने में भी आता है कि जिन घटनाओं से एक व्यक्ति प्रभावित हो रहा हो, जरूरी नहीं है की कोई दूसरा व्यक्ति भी प्रभावित हो| यह उनके अहंकारों के अलग अलग आकार होने का प्रमाण है|
अहंकार आग्रह करता है, आग्रह उसके पोषण का| अहंकार आग्रह करता है कि उसका जैसा आकार है, उसका आकार वैसा ही बना ही रहे या फिर और पुष्ट हो जाए, सख्त हो जाए| निरंतर अहंकार इसी प्रयास में लगा रहता है कि उसका पोषण हो, उसे अपने अस्तित्व के बने रहने या बढने कि आश्वस्ति मिलती रहे| क्योकि अहंकार आश्वस्ति चाहता है अपने अस्तित्व के बने रहने की या और सख्त हो जाने की तो वह एक निरंतर भय से पीड़ित भी रहता है| भय कि भविष्य में पोषण होगा या नहीं, मेरा अस्तित्व बना रहेगा या नहीं, जिन स्रोत से पोषण होता है वे बने रहेंगे या नहीं, कहीं स्रोत बदल ना जाएँ, कहीं मेरा पोषण कि जगह शोषण ना हो जाए इत्यादि| अहंकार सुरक्षा चाहता है| अहंकार जब असुरक्षित महसूस करता है तो वह परेशान हो जाता है, आग्रह कि तीव्रता को और बड़ा लेता है, आग्रह पूरा ना होने पर अपनी तीव्रता को और बढाता चला जाता है और अंततः एक हिंसक रूप धारण कर लेता है|जीजस क्राइस्ट जैसे व्यक्ति को भी घोर यातनाएं देकर सूली पर चडाने को तैयार हो जाता है, घोर युद्ध करवाता है, संबंधों को उजाड़ कर रख देता है और व्यक्तिगत स्तर पर मानसिक पीड़ा और अतृप्ति का अनुभव कराता है|ऐसा है अहंकार का स्वरुप|
अभी भी यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि अहंकार है क्या? कहाँ से आया ये? जैसा मैंने अभी तक अहंकार को जाना है, जैसा भी अभी मैं स्वयं को सापेक्षता में पहचानता हूँ वह मेरा अहंकार ही है| स्वयं कि सापेक्ष पहचान अहंकार है| अगर स्वयं की सापेक्ष पहचान अहंकार है और वह अगर इतने भयावह परिणाम दे सकती है तो इसका समाधान क्या है?
ऐसा तो नहीं है की मैं स्वयं अहंकार से मुक्त हो गया हूँ, पर जितनी भी मेरी समझ अभी तक बनी है उसके आधार पर अपने अनुभव को बंटाना चाहूँगा| अगर सापेक्ष पहचान एक समस्या है तो पहले तो यह स्वयं में एक आश्वस्ति बने कि मेरी किसी निरपेक्ष पहचान का अस्तित्व भी है| इस आश्वस्ति के आधार पर इस बात कि आश्वस्ति बढती जाती है कि अहंकार से मुक्ति संभव है और अहंकार मैं नहीं हूँ, बल्कि अहंकार मुझ में है| स्वयं की निरपेक्ष और सापेक्ष पहचान की समझ के साथ अहंकार से मुक्ति का तरीका भी समझ में आने लगता है| यह समझ में आने लगता है कि अहंकार को मैंने ही पकड़ा हुआ है, उसने मुझे नहीं पकड़ा हुआ| स्वयं में स्वयं की समझ के फलस्वरूप अहंकार से धीमे धीमे मुक्ति होती चली जाती है| स्वयं कि समझ है तो अहंकार नहीं है, अहंकार है तो स्वयं की समझ में कमी है| इस प्रक्रिया में मैं भी प्रयासरत हूँ|