यह एक बहुत ही पुराने गांव की बात है| उस गांव के लोगों में रात के अँधेरे को लेकर एक काफी विचित्र सी अवधारणा थी| जिस तरह से बारिश में पानी बरसता है जमीन पर, इस गांव के लोग मानते थे की रात को अँधेरा बरसता है जमीन पर| और तो और ये लोग यहाँ तक मानते थे की जिस तरह से हम बारिश का पानी गांव की परिधि से बाहर फेंक सकते हैं और गांव को पानी से मुक्त कर सकते हैं, उसी तरह से हम रात के अँधेरे को भी गांव के बाहर फेंक सकते हैं और गांव को अँधेरे से मुक्त कर सकते हैं| इस मान्यता के तहत हर रात को उस गाँव के कुछ लोग पानी की तरह बाल्टियों में अँधेरे को लेकर गांव की परिधि पर जाते और अँधेरे को बाहर फेंक देते| हर रात को कुछ लोगों की अँधेरे को गाँव के बाहर फेंकने की ड्यूटी लगा करती| पूरी रात भर यह काम चला करता| सुबह जब रौशनी आना चालू हो जाती तो ये लोग सोचते कि हम अँधेरे को गांव के बाहर फेंकने में सफल हो गए|
बस इतनी ही है कहानी|
यह कहानी मैंने अभी कुछ ही दिनों पहले इस लिंक पर लिखी थी| यहाँ पर मैंने अपने विचार इस कहानी पर प्रस्तुत नहीं किये थे और पाठकों से अनुरोध किया था कि वे अपने विचार इस कहानी पर प्रस्तुत करें| कुछ पाठकों ने अपनी टिप्पणियां प्रस्तुत भी की| इस लेख में मैं अपने विचार इस कहानी पर प्रस्तुत करूँगा|
इस कहानी में मैंने बहुत कुछ देखा| अगर इन गांव वालों को पता होता कि रात के अँधेरे के ऊपर इनका कोई बस नहीं है तो वे रात को अँधेरे को गांव के बहार फेंकने की कोशिश करने के बजाये रात को आराम से सोते और सुबह होने का इंतज़ार करते| सुबह होते होते अँधेरा खुद-ब-खुद चला जाता| नियम की समझ के बाद इंसान को समझ में आता है कि क्या करना उसके हाथ में है और क्या अपने आप होता है| जो अपने आप होता है उसको करने की कोशिश करना या उससे अन्यथा करने की कोशिश करना ही दुःख है| जब नियम समझ में आता है तो जो प्रयास उसको करने में या उससे अन्यथा करने में लग रहा था वह रुक जाता है| निरर्थक प्रयास का रुक जाना ही दुःख से मुक्ति अथवा सुख है| यह नियम की समझ के साथ ही हो सकता है|
अगर हम अपने जीने को ध्यान से देखें तो हम भी इन गांव वालों से कुछ अलग नहीं हैं|या तो हम नियम के विरुद्ध काम करते हैं या फिर जो अपने आप होता है उसको करने के प्रयास में लगते हैं| दोनों में ही हम दुखी होते हैं|जैसे अगर हम यह नियम मानें कि “ज्ञान ही सुख का आधार है” तो या तो हम ज्ञान के अलावा हर जगह सुख को खोजने में लगे रहते हैं या फिर ज्ञान पाने के ही प्रयास में लग जाते हैं| ज्ञान पाने का प्रयास भी ज्ञान की उपलब्धि में एक अवरोध है| यह तभी समझ में आ सकता है जब ज्ञान का सही अर्थ स्पष्ट हो|ज्ञान पाया नहीं जा सकता, वह केवल हो सकता है|