बेचैन रहती है नदी
क्यों सागर की खातिर,
मिलना जिसमें मिट जाना है …
खुद खार होना है
अनदेखा करती
चली जाती है
जंगल के प्यार को लेकिन
हरा होता है जो उस से
जिस में वह खुद
हरी होती है|
— नन्द किशोर आचार्य जी
बेचैन रहती है नदी
क्यों सागर की खातिर,
मिलना जिसमें मिट जाना है …
खुद खार होना है
अनदेखा करती
चली जाती है
जंगल के प्यार को लेकिन
हरा होता है जो उस से
जिस में वह खुद
हरी होती है|
— नन्द किशोर आचार्य जी
Good one..
reminds me of that saying.. Door ke dhol suhaavne 🙂