जो जितना महत्वकांक्षी है उसने पैसे, प्रतिष्ठा और सम्मान को उतना ही अधिक महत्त्वपूर्ण माना है और वह उतना ही ईर्ष्यालु, घृणालु, प्रतिस्पर्धात्मक तथा हिंसक है|
बचपन से ही हमें यह सिखाया जाता है महत्वकांक्षी बनो, सफल हो, सबसे अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो, कक्षा में प्रथम आओ इत्यादि| बचपन से ही पढाई का उद्देश्य हमारे लिए यही होता है, कक्षा में प्रथम आना, अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होना, अपना और अपने माँ बाप का नाम रोशन करना, प्रतिष्ठा कमाना और बाद में एक ज्यादा पैसे कमाने वाली नौकरी को पा लेने की अपनी योग्यता को विकसित करना| हमारे शिक्षक भी यही सिखाते हैं| बचपन से ही हमें दूसरों के आधार पर अपना आँकलन करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है| दूसरों से आगे निकलना, उनसे अच्छे अंक लाना, कक्षा में प्रथम आना इत्यादि| हमारे माता, पिता, अभिभावक, शिक्षक सभी हमें यही सिखाते हैं| अब हर बच्चा तो कक्षा में प्रथम आ नहीं सकता, तो इस प्रणाली में हर व्यक्ति हर दूसरे का प्रतियोगी है, सहयोगी नहीं| बचपन से ही हमें प्रतिस्पर्धात्मक बनने का प्रशिक्षण दिया जाता है| किस चीज़ की प्रतिस्पर्धा? हर चीज़ की! चाहे वह खेल कूद हो, पढाई हो, रंग रूप हो, धर्मं हो, विचार हो, कपडे तथा उनको पहनने का तरीका हो, रहन सहन का ढंग हो, बात करने का तरीका हो या कोई भी चीज़ हो| प्रतिस्पर्धा हर चीज़ में हमारे अन्दर समायी हुई है| बच्चे दूसरे बच्चों से अंको में प्रतिस्पर्धा करते हैं और बड़े दूसरे बड़ों से अपने बच्चों के अंकों के आधार पर| बच्चे और बड़े दोनों ही प्रतिस्पर्धा में शामिल हैं|
बचपन में होती है अंकों, कपडों, रंग रूप, खेल कूद में प्रतिस्पर्धा| बड़े होने पर होती है विचार, ज्ञान, पैसा, प्रतिष्ठा, धर्म, रंग रूप, पद, बल, बुद्धि आदि की प्रतिस्पर्धा| जैसे किसका विचार ज्यादा श्रेष्ठा है, कौन ज्यादा ज्ञानी है, कौन ज्यादा समाज में प्रतिष्ठित है, कौन सा धर्म ज्यादा उच्च है, कौन ज्यादा सुन्दर है, किसके पास ज्यादा पैसा है, किसका रहन सहन का ढंग ज्यादा उच्च है इत्यादि| यही प्रतिस्पर्धा जन्म देती है इर्ष्या, घृणा तथा हिंसा को| जो जितना महत्वकांक्षी है वह उतना ही प्रतिस्पर्धात्मक है| उसमें उतनी ही इर्ष्या की संभावना है, घृणा की संभावना है और वह उतना ही हिंसक है| जब तक यह महत्वकांक्षी व्यक्ति अपने आस पास के लोगों से आगे रहता है इसकी यह इर्ष्या, घृणा तथा हिंसा उसके अन्दर ही दबी रहती है पर जैसे ही उसके आस पास का कोई व्यक्ति उससे ऊपर उठने लगता है तो उसमें यह इर्ष्या, घृणा, द्वेष तथा विरोध का भावः जाग उठता है| अब वह दूसरा व्यक्ति उसे सहयोगी की तरह नहीं दीखता, उसे वह प्रतियोगी की तरह दिखने लगता है| उससे आगे निकलने की चाह उसमें प्रबल होने लगती है| इस चाह के चलते अब वह अपना पोषण करने के लिए दूसरे व्यक्ति का शोषण करने को भी तैयार हो जाता है| इसमें वह कई सारी चीज़ें करने को तैयार हो जाता है जैसे, दूसरे व्यक्ति को नीचा दिखाने की कोशिश करना, दूसरे व्यक्ति को अपने सफलता के मार्ग से हटाने की कोशिश करना, दूसरे व्यक्ति का बुरा करने की कोशिश करना, यहाँ तक कि दूसरे व्यक्ति को ख़त्म तक कर देने की कोशिश करना| जितनी अधिक महत्वाकांक्षा, उतनी ही अधिक प्रतिस्पर्धा की भावना, उतनी ही अधिक इर्ष्या, घृणा, द्वेष तथा हिंसा की संभावना| ये है हमारा समाज जिसका हम सब मिल कर पोषण करते हैं|
अभी हमने जिस तरह के समाज कि रचना कर रखी है उसमें अधिक महत्वकांक्षी व्यक्ति ही अधिक से अधिक लोगों का रोल मोडल बना बैठा है| वही प्रतिष्ठा पा रहा है, उसका ही अनुसरण किया जा रहा है| वही दूसरे लोगों के लिए निर्णय लिए जाने के लिए प्रतिनिधि के रूप में चुना जा रहा है| उसी के उदाहरण अधिक अधिक से अधिक माँ, बाप, शिक्षक, अभिभावक अपने बच्चों को दे रहे हैं, वही सफल कहलाया जा रहा है| उसी को प्रेक्टिकल तथा दुनियादारी की कला में पारंगत माना जा रहा है| इन्ही महत्वाकांक्षियों ने जन्म दिया है हमारे इस लाभोंमादी अर्थशास्त्र को, भोगोंमादी समाजशास्त्र को तथा कमोंमादी मनोविज्ञान को| इस तरह के समाज में हर व्यक्ति महत्वकांक्षी बनने और अपनी महत्वकांक्षा को पूरा करने में लगा है जिसमें अगर उसे दूसरे व्यक्ति का शोषण भी करना पड़े तो वह उसके लिए तैयार है| इसी के कारण समाज में भय तथा अन्य जो अव्यवस्थाएं हैं जो हम देखते हैं|
यहाँ एक चीज़ और भी है, जो जितना महत्वकांक्षी है उसने पैसे, प्रतिष्ठा और सम्मान को उतना ही अधिक मत्वपूर्ण माना है तथा संबंधों का उतना ही अधिक तिरस्कार किया है| इस महत्वाकांक्षा ने हमारी आँखों को इस तरह से चौंधिया कर के रखा है कि संबंध भी कोई मुद्दा है हमें समझ नहीं आता| हमारे लिए हर वह वस्तु जो हमारी प्रतिष्ठा को बढाएगी, प्रिय हो जाती है| यहाँ तक कि हम संबंधों को भी एक लाभ, आराम, मजा, मनोवैज्ञानिक सुरक्षा तथा प्रतिष्ठा को बढाने के साधन के रूप में देखते हैं| जब तक हमारी यह महत्वकंशाएं पूरी हो रही हों संबंधों से तब तक ही हम उन्हें बनाये रखते हैं तथा महत्वाकांक्षा पूरी ना होने पर हम उनके प्रति उदासीन हो जाते हैं| अगर संबंधों को हमें महत्वाकांक्षाएं पूरा करने के लिए तोड़ना भी पड़े तो हम उसके लिए भी तैयार हो जाते हैं| देखने में आता ही है किस तरह से दो महत्वकांक्षी भाई पैसे, प्रतिष्ठा के लिए अलग हो जाते हैं| इस महत्वकांक्षा के जहर ने हमारे घरों को भी नहीं छोडा|
एक व्यक्ति के स्तर पर भी अगर हम देखें तो यही नज़र आता है कि इस महत्वकांक्षा के बोझ तले वह खुद भी दबा हुआ है| पैसे प्रतिष्ठा को उसने जितना महत्त्वपूर्ण माना है उतना ही उसमें भय व्याप्त है उसे ना पा पाने का या फिर उसे खो देने का या फिर और नहीं बढा पाने का| देखने में आता ही है किस तरह से एक बच्चा कक्षा में प्रथम ना आ पाने पर आत्महत्या कर लेता है| किस तरह से घर में चोरी हो जाने पर या पैसे प्रतिष्ठा को खो देने पर व्यक्ति महसूस करता है कि वह मिटटी में ही मिल गया| किस तरह से वह वह अपनी जोड़ी हुई प्रतिष्ठा को खो देने के भय से भयभीत रहता है|
अगर कुल मिलाकर के देखें तो यही देखने में आता है कि इस महत्वकांक्षा ने हमारे समाज, प्रकृति, घर, संबंध, मानव किसी को भी नहीं छोडा| हर जगह पर अव्यवस्था ही अव्यवस्था है| तो प्रश्न यहाँ पर यह खडा होता है कि यह सब हो कैसे गया? इसको समझने के लिए हमें स्वयं को समझने कि जरूरत है| आइये इस बारे में कुछ बात करें|
हर व्यक्ति स्वयं में सुख, विश्वास तथा सम्मान पूर्वक जीना चाहता है| महत्वकांक्षा का सम्मान से काफी बड़ा संबंध है| सम्मान की सही समझ ना होने के कारण ही व्यक्ति ईर्ष्यालु, घृणालु, द्वेषी तथा हिंसक हो जाता है| जो जितना महत्वकांक्षी है उसने सम्मान, प्रतिष्ठा को उतना ही अधिक महत्त्वपूर्ण माना है, पर उसे सम्मान क्या है? प्रतिष्ठा क्या है? यह स्पष्टता नहीं रहती, जिसके कारण ही सारी समस्यायें हैं| सम्मान को समझने के लिए स्वयं को समझने की जरूरत है| सम्मान का अर्थ है स्वयं का सही मूल्यांकन| स्वयं में स्वयं की समझ के अभाव में इंसान दूसरे व्यक्ति की नज़रों से अपने आप को देखता है, अगर दूसरे व्यक्ति का नज़रिया उसके प्रति अच्छा है तो वह सम्मानित महसूस करता है नहीं तो असम्मानित| इसीलिए जो चीज़ें दूसरे व्यक्ति के लिए महत्त्वपूर्ण होती हैं वे उसके लिए सम्मान तथा प्रतिष्ठा को सुनिश्चित करने का आधार बन जाती हैं और यहीं से शुरू होती है प्रतिस्पर्धा| जैसे अगर प्रचलन में एक बहुत ही बड़ा घर प्रतिष्ठा की वस्तु माना गया है तो हर व्यक्ति फिर बड़ा घर ही बनाना चाहता है| प्रतिस्पर्धा के जन्म लेते ही जन्म लेती है इर्ष्या, घृणा, द्वेष तथा हिंसा|
हर व्यक्ति में अपने महत्व को जानने की आकांक्षा जन्म से ही रहती है पर व्यक्ति अपनी इस आशा से अनभिज्ञ रहता है जिसके कारण वह अपने महत्व को सापेक्षता में, दूसरे लोगों के देखने के आधार पर या स्वयं को किसी चीज़ से जोड़ लेने के आधार पर पहचानता है| बल्कि मुझे यह कहना चाहिए कि उसके ९०% से ऊपर कार्य अपने आप को महत्त्वपूर्ण मानने और मनवाने के लिए ही हो रहे हैं| देखने में आता ही है कि किस तरह से व्यक्ति अलग अलग चीज़ों से जुड़ जाता है स्वयं में महत्त्वपूर्ण महसूस करने के लिए| किसी विशेष तरह के विचार से जुड़ जाना, समाज सेवा में लग जाना, किसी विशेष धर्म संप्रदाय से जुड़ जाना, बड़ी बड़ी डिग्रियां हासिल कर लेना, बड़ा घर बना लेना, किसी प्रसिद्ध व्यक्ति का सान्निध्य प्राप्त करने कि कोशिश करना, सुन्दर बने रहने का प्रयास करना, अजीबो गरीब तरह के वस्त्र पहनना, अजीबो गरीब भाषा का प्रयोग करना और भी कई सारी चीज़ें हम करते रहते हैं स्वयं में महत्त्वपूर्ण महसूस करने के लिए और अपना महत्व दूसरे व्यक्ति को जताने के लिए| यहाँ पर एक चीज़ और भी होती है कि जिस वस्तु के आधार पर व्यक्ति अपने महत्व को पहचानता है उस वस्तु के ऊपर अगर कोई ऊँगली उठा दे तो वह व्यक्ति उसका विरोधी हो जाता है, घृणा, इर्ष्या तथा विरोध का भावः उस व्यक्ति के लिए उसके मन में आने लगता है| जिस भी वस्तु के आधार पर वह अपने महत्व को पहचानता है उसकी यह अपेक्षा रहती है कि उसके आस पास के लोग भी उसको उसी वस्तु के आधार पर महत्त्वपूर्ण मानें| जैसे अगर में स्वयं को ज्ञानी मानता हूँ तो मेरी अपेक्षा रहती है मेरे आसपास के लोग भी मुझे ज्ञानी मानें| जो लोग मानते हैं वे मुझे प्रिय हो जाते हैं, जो नहीं मानते वे मुझे विरोधी कि तरह नज़र आते हैं| ये है हमारी महत्वाकांक्षा| इन सब में यही देखने में आता है कि इनमें से किसी भी चीज़ के आधार पर स्वयं में महत्त्वपूर्ण महसूस होने का जो भावः है उसकी निश्चितता, निरंतरता, स्थिरता नहीं बनी रहती| आज जो चीज़ प्रचलन में है अगर कल वह नहीं रहती तो मेरा मूल्य घट जाता है| आज जो व्यक्ति मुझे अच्छा देख रहा है अगर वह कल अच्छा नहीं देखता तो मेरा मूल्य घट जाता है| फिर मुझे दोबारा से महत्त्वपूर्ण होने के लिए तथा अपना मूल्य बढ़ाने के लिए कार्य करना पड़ता है| पूरा जीवन हम इसी दौड़ में निकाल देते हैं|
स्वयं में स्वयं के महत्व को जानने कि आकांशा मनुष्य में जन्म से ही रहती है| इसका प्रयोजन है मनुष्य अस्तित्व में अपने प्रयोजन को, महत्व को जाने, वास्तविकता को जाने| स्वयं में स्वयं की इस चाहना के ज्ञान के अभाव में व्यक्ति अपनी महत्वकांक्षाओं को पूरा करने के लिए हिंसक बन जाता है और खुद भी दुखी रहता है| स्वयं के महत्व को जाने बिना इंसान तृप्त भी नहीं होता है| इसके लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि इंसान अपने ऊपर ध्यान दे और अपने ही अन्दर बनी हुई अपनी आकांक्षा को पहचाने और वह कैसे पूरी होगी इस बारे में पता लगाने का प्रयास करे| स्वयं में स्वयं के महत्व को जानने के लिए इंसान को ज्ञान चाहिए| ज्ञान का अर्थ है स्वयं में स्वयं, अस्तित्व तथा अस्तित्व में अपनी भागीदारी का ज्ञान|
अगर हम अपनी शिक्षा प्रणाली को देखें तो उसमें इंसान कि मूलभूत आवश्यकता के बारे में कोई बात नहीं होती| हमारी शिक्षा प्रणाली अभी यही सिखाती है कि आप महत्वकांक्षी बनिए, पैसे और प्रतिष्ठा बढ़ाने की अपनी योग्यता को विकसित कीजिये| यही है आज की शिक्षा जो अधिक से अधिक ईर्ष्यालु, घृणालु, द्वेषी और हिंसक लोगों को जन्म दे रही है| शिक्षा में “स्वयं का अध्ययन” के पक्ष को लाना अत्यंत ही आवश्यक है|
When you say “Shikha Pranali”. Are you talking about the books that we study, courses that we take and exams that we write? Or the social perception of the education.
I feel the The Education system has one big flaw that it just tests the knowledge of a particular subject by making you write an exams. It doesn’t care whether you understand what you are writing in your paper.
Other than that I think its good enough. It nowhere tells you to be “Mahatwakanchi”, infact I have read several stories and poems which tell you to think about others before thinking about yourself.
I just feel the social perception towards education is flawed. Certainly a better education enables to do things in a better way and think in a better way. But after that its one’s upbringing, the surroundings and one’s own self that makes him chose his path.
@Rakesh:
Thanks for your comment. Appreciate it.
When I talk about “Shiksha Pranali”, then I mean current education system gives “How to earn a living?” kind of education and not the “How to live?”. You might say that there were Moral Science courses and all but that is not what I am talking about when I say education related to “How to live?”. Education which draws attention of a human being towards himself is education about “How to live?”. Education which addresses questions related to basic desire of a human being is missing. Due to lack of this education we have created this system which we see.
Secondly when I say education system is making individual more and more “Mahatvakankshi” then what I mean is, it is implicit. More marks, more respect, more rank, greater grade etc. This notion is nothing but making them “Mahatvakankshi”. Basic question of human need like Happiness, Trust and Respect are not talked about.
You are also right in saying that a person’s surrounding, environment, his own self-study make him. Unfortunately in our entire social structure we are trained to become “Mahatvakankshi”.
Predominant misconception in human
More resources = More Respect, More Happiness, Better relationships, More recognition.
एक गूढ़ ,अत्यंत सरल एवं मानव सभ्यता की दृष्टि से परम आवश्यक ज्ञान छुपा है इस लेख में। स्वयं को पहचानना एवं अपने व्यक्तित्व का निर्माण करना ही हमारा मूलता को सिद्ध करता है,। धन्यवाद 🙏