संबंध एक दर्पण है

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संबंध एक ऐसा दर्पण हैं जिसमें आपको आपकी असली सूरत नज़र आती है|

एक दर्पण तो वह है जिसमें आप अपना शारीरिक चेहरा देखते हैं, दूसरा दर्पण यह संबंध है जिसमें आपको आपकी असली सूरत नज़र आती है| संबंध के बिना अपने आप को जान पाना अत्यंत ही कठिन कार्य है| संबंध में ही हमें पता लगता है कि हम असलियत में क्या हैं| शायद आप लोग सोच रहे होंगे कि मैं जाने क्या बात कर रहा हूँ, कौन सा दर्पण? क्या जानना होता है संबंध में? आइये इस बारे में कुछ बात करें|

अक्सर हम लोग संबंध को अपनी एक मनोवैज्ञानिक, मानसिक, भावात्मक, भावनात्मक, आर्थिक आदि सुरक्षा प्रदान करने के एक स्रोत कि तरह देखते हैं| ऐसा मानने के मूल में संबंध की समझ का अभाव ही है| संबंध जरूरत पूरा करने का साधन नहीं है| इस तरह की निर्भरता को पूरा करने के आधार पर बनी हुई संबंध में स्वीकृति की स्थिरता नहीं बनी रहती| स्वयं में स्वीकृति की अस्थिरता स्वयं में दुःख का कारण बनती है| अगर यहाँ तक आपकी और मेरी सहमति है तो हम आगे की बात कर सकते हैं जिसमें हम संबंध दर्पण किस तरह है इस बारे में बात कर सकते हैं|

यहाँ तक हमें यह तो समझ में आ ही गया है कि स्वयं में स्वीकृति, विश्वास का अभाव ही स्वयं में दुखों का कारण है| संबंध में ही हमें यह देखने को मिलता है कि हमारी दूसरे व्यक्ति से क्या अपेक्षाएं बनी हुई है, दूसरे व्यक्ति के नज़रिए का हम पर क्या प्रभाव पड़ रहा है, हम अपने आप को किस तरह देखना, दिखाना चाहते हैं, हम दूसरे व्यक्ति से क्या पाना चाहते हैं, हमें संबंध में क्या अच्छा लगता है, क्या नहीं लगता है, कैसा होना हमें पसंद है, कैसा नहीं है, क्या हमें सहज रूप से स्वीकार है, क्या नहीं है, हमारे अन्दर दूसरे व्यक्ति के प्रति क्या भावः बन रहा है, हमारे अन्दर बना भावः किस तरह से हमारे व्यवहार में परिलक्षित हो रहा है, किस तरह से संबंध बदल रहे हैं, किस व्यक्ति से बात करते हुए हम अपने आप में कितने आराम में हैं, किस व्यक्ति को हम किस नज़रिए से देखते हैं, हमारे अन्दर किस तरह के आकर्षण हो रहे हैं, किस तरह के प्रत्याकर्षण हो रहे हैं, किस तरह की प्रतिमा हमने अपने मन में अपनी बना रखी है, संबंध में मिलने वाले सुख के होने पर बाकी चीज़ों पर हमारी निर्भरता किस तरह से कम हो रही है और यह सब क्यों हो रहा है इस सब कि तरफ भी एक अच्छा खासा ध्यानाकर्षण संबंध में ही हो पाता है| बिना संबंध के यह ध्यानाकर्षण खुद पर हो पाना एक अत्यंत ही कठिन काम है| इसीलिए मैंने कहा कि संबंध एक ऐसा दर्पण है जिसमें हमें अपनी असली सूरत नज़र आती है|

स्वयं में यह ध्याकर्षण ही स्वयं में अवलोकन की क्रिया को प्रोत्साहन प्रदान करता है, उसे आगे बढाता है, स्वयं को समझने में मदद करता है तथा स्वयं के भावः में अधिक स्थिरता लाता है| स्वयं में भावः की स्थिरता तथा स्वयं में विश्वास ही स्वयं में सुख है और यह स्वयं की समझ के बिना नहीं आ सकती|

One response »

  1. सम्बन्धों में तृप्ति है, हर मानव की चाह.
    मगर इसे समझे बिना बने ना कोई राह.
    बने ना कोई राह, तो सुख फ़िर कैसे पाये.
    सुख की चाहत में हर मानव भटका जाये.
    कह साधक कवि,पाओ समझ-पूर्वक शक्ति.(भक्ति)
    हर मानव की चाह है सम्बन्धों में तृप्ति.

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