हर व्यक्ति दूसरों से विश्वास की अपेक्षा रखता है पर उसमें खुद में विश्वास कर पाने की समझ/योग्यता नहीं रहती| विश्वास कर पाने की योग्यता ही एक व्यक्ति के व्यक्तित्व की सुन्दरता है तथा परस्परता में अभय का आधार है| दुर्भाग्यवश हमें बचपन से ही अविश्वास करना ही सिखाया जाता है|
अगर हम एक बहुत छोटे बच्चे के आचरण को देखें तो यह देखने में आता है कि वह अपने आस पास के लोगों पर पूरी तरह से विश्वास करता है, निरपेक्ष विश्वास करता है| वह यह माना रहता है कि उसके आस पास के लोग जो बोल रहे हैं जो कर रहे हैं वह पूरी तरह से सही है, इसीलिए वह उनका अनुकरण करने को तैयार रहता है| वह अपने आस पास के लोगों के प्रति पूरी तरह से समर्पित रहता है| उनको निरपेक्ष रूप से स्वीकारे रहता है| उसकी अपने आस पास के लोगों के प्रति स्वीकृति बिना किसी शर्त के बनी रहती है| वह अगर दूसरे व्यक्ति के साथ ऐसा कुछ आचरण भी करे जो कि प्रचलित मान्यताओं में अच्छा नहीं माना जाता तो भी उसे कुछ फरक नहीं पड़ता क्युकी वह अभी प्रचलित मान्यताओं से अनभिज्ञ है| उसे इस बात का फरक नहीं पड़ता कि दूसरा व्यक्ति उसके बारे में क्या सोच रहा है, उसे इस बात का भी फरक नहीं पड़ता कि दूसरा व्यक्ति उसके बारे में कैसी धारणा बनाये हुए है या वह व्यक्ति उसका हितैषी भी या नहीं| हर व्यक्ति को वह स्वीकारे रहता है|
साथ ही साथ वह बच्चा अपने वातावरण की प्रचलित मान्यताओं को भी सीखने लगता है| क्यूंकि यह बच्चा अपने आस पास के लोगों पर निरपेक्ष विश्वास करता है इसलिए वह उनकी हर बात को बिना जांचे स्वीकार कर लेता है| ये अच्छा है ये बुरा है, ऐसा करना अच्छा है, ऐसा करना बुरा है, इस तरह का आदमी अच्छा है, उस तरह का आदमी बुरा है, ऐसा दिखना अच्छा है, वैसा दिखना बुरा है, इस तरह बात करना अच्छा है, उस तरह बात करना बुरा है इत्यादि| इस तरह की कई सारी मान्यताएं वो अपने अन्दर भर लेता है, कई सारे पैटर्न सीख लेता है| यहाँ से उसकी सरलता खोना चालू कर देती है| अब वह दूसरों को निरपेक्ष रूप से नहीं स्वीकारता, अब वह उनको इन मान्यताओं के आधार पर स्वीकारता है| अगर उसे दूसरा व्यक्ति उसकी मान्यताओं की अनुरूपता में अच्छा महसूस होता है तो वह उसे स्वीकारता है अन्यथा नहीं स्वीकारता| अगर दूसरा व्यक्ति उसको उसकी अच्छी मान्यताओं की अनुरूपता में नहीं देखता तो वह परेशान हो जाता है और अगर वह खुद कुछ ऐसा कर बैठे जो प्रचलित मान्यताओं में अच्छा नहीं माना जाता तो वह निराश हो जाता है, डिप्रेशन में आ जाता है| उसने जो अपने वातावरण, शिक्षा तथा अनुभवों से सीखा होता है उसी के आधार पर वह अपने आप को तथा बाकी पूरी दुनिया को देखता है| उतनी ही उसकी दृष्टि बनी रहती है|
बचपन से ही बच्चों को अपने पराये का भेद करना सिखाया जाता है| दूसरे लोगों को अस्वीकार करने, अविश्वास करने तथा भेद के आधार पर सम्मान करना सिखाया जाता है| हमारे माता पिता बचपन से यही सिखाते हैं हमारा धर्म हिन्दू है उसका धर्म मुस्लिम है, सफ़ेद चमड़ी का व्यक्ति ज्यादा सुन्दर है, अच्छे अंक लाने वाला बच्चा ज्यादा समझदार है, अच्छे कपडे पहनने वाला बच्चा ज्यादा अच्छा है, ये हमारे देश का है, ऐसा विचार सुन्दर विचार है, वैसा विचार बेकार है, ऐसा होना अच्छा है, वैसा होना गन्दा है, ज्यादा पैसा होना अच्छा है आदि| हमारे माता पिता अभिभावक आदि के आचरण से भी हमें यही सीखने को मिलता है कि अपने पराये का भेद करो| देखने में आता ही है किस तरह कि चीज़ों के लिए वे हमें टोकते हैं “उसके साथ मत खेलो”, “उससे बात मत करो”, “कैसा दीखता है वो”, “उनका लड़का तो बहुत ही सुन्दर है”, “उसके कभी अच्छे नंबर नहीं आते”, “उस मोहल्ले में तो बहुत सारे मुस्लिम रहते हैं”, “उनके विचार अच्छे नहीं हैं”, “वो तो ऐसा सोचते हैं”, “वो कितने अच्छे कपडे पहनते हैं” आदि| इन सब तरह कि चीज़ों से एक बच्चे कि मानसिकता में यही बैठ जाता है कि इस तरह से जीना अच्छा है, उस तरह से जीना अच्छा नहीं है| ये अच्छे बुरे की मान्यताएं ही उस बच्चे के उसके खुद के प्रति तथा बाकी दुनिया के प्रति नज़रिए का निर्धारण करती है| अगर हम आज की दुनिया में देखें तो जो जितनी ज्यादा मान्यताएं अपने साथ उठाए रहता है वह उतना प्रेक्टिकल माना जा रहा है| वही दुनियादारी की कला में पारंगत माना जा रहा है| जिसमें जितनी अपने पराये का भेद करने की योग्यता है, जिसमें जितनी दूसरों को अस्वीकार कर देने की योग्यता है वह उतना ही काबिल माना जा रहा है और वह इसी बात का प्रचार प्रसार करने में भी लगा है कि किसी पर विश्वास मत करो|
यहाँ पर एक चीज़ और भी होती है, वो लोग भी जो यह कहते हैं कि किसी पर विश्वास मत करो, उनकी भी यह अपेक्षा बनी रहती है कि उन पर विश्वास किया जाए| बल्कि अगर हम ध्यान से देखें तो यह देखने में आता ही है कि हर व्यक्ति अपने आस पास के लोगों से निरपेक्ष विश्वास तथा सम्मान कि चाहना रखता है| हर व्यक्ति चाहता है कि उसके आस पास के लोग उस पास विश्वास करें, उसका सही मूल्यांकन करें और किये ही रहे| जिस व्यक्ति की जिस तरह की मान्यताएं रहती हैं वह व्यक्ति उसी तरह से विश्वास तथा सम्मान का अनुभव करता है| जैसे अगर मैं अपने आप को ज्ञानी मानता हूँ तो मेरी अपने आस पास के लोगों से अपेक्षा रहती है कि वे मुझे ज्ञानी ही समझें| जो लोग मुझे ज्ञानी की तरह देखते हैं उनके साथ मैं आराम महसूस करता हूँ परस्परता में विश्वास का तथा सम्मान का अनुभव करता हूँ और जो लोग नहीं समझते उनके साथ उतना आराम महसूस नहीं करता| यहाँ पर मूल मुद्दा तो यही है विश्वास तथा सम्मान की चाहना एक व्यक्ति मैं नित्य ही बनी रहती है| ऐसा एक भी पल नहीं जब व्यक्ति विश्वास तथा सम्मान नहीं चाहता|
अगर हम ध्यान से देखें तो यही देखने में आता है कि हर व्यक्ति विश्वास तथा सम्मान की अपेक्षा तो रखता है परन्तु विश्वास कर पाने तथा सम्मान कर पाने की योग्यता उसमें नहीं रहती| जिसके ही कारण दूसरे व्यक्ति के साथ अपने पराये का भेद उसमें बना ही रहता है| जिस तरह से वह विश्वास का अनुभव करता है अगर दूसरा व्यक्ति उसे उसी तरह से विश्वास का अनुभव नहीं करा पाता तो वह दूसरे व्यक्ति को एक विरोधी की तरह देखने लग जाता है और यहीं से हिंसा कि शुरुआत होती है| जैसे अगर में स्वयं को सुन्दर मानता हूँ और इसके आधार पर अपनी पहचान बनाता हूँ तो मेरी अपेक्षा दूसरों से यह रहती है कि वे भी मुझे सुन्दर मानें| जो लोग मुझे सुन्दर मानते हैं वे मुझे अच्छे लगते हैं, जो नहीं मानते वो बुरे लगते हैं और उनके प्रति विरोध का भावः मेरे मन में आने लगता है| अगर मेरे आस पास में दूसरा कोई व्यक्ति जो मुझसे भी सुन्दर हो वो आ जाए तो मुझमें हीन भावना पनपने लगती है तथा उस दूसरे व्यक्ति को मैं अपने प्रतियोगी कि तरह देखने लगता हूँ| यहीं से मूल आतंरिक हिंसा कि शुरुआत होती है जो कि बाद मैं बाहरी हिंसा के रूप मैं अपने आप को परिलक्षित करती है|
हमारे संबंधों मैं यही होता है| जिस व्यक्ति के साथ हम विश्वास तथा सम्मान का अनुभव करते हैं वह हमें ज्यादा प्रिय हो जाता है और जिसके साथ नहीं करते वो कम प्रिय| पर यह तो देखने में आता ही है कि जिस व्यक्ति के साथ हमें विश्वास तथा सम्मान का अनुभव होता है वह भले ही शारीरिक रूप से सुन्दर ना हो तो भी हमें उसमें काफी सुन्दरता नज़र आती है| यही है उस व्यक्ति के व्यक्तित्व की सुन्दरता| जिस व्यक्ति के साथ हमें विश्वास तथा सम्मान का अनुभव नहीं होता वह व्यक्ति भले ही शारीरिक रूप से बहुत ही सुन्दर हो पर हमें तब भी उसमें सुन्दरता नज़र नहीं आती| यहाँ पर यही देखने में आता है कि सुन्दरता के प्रति हमारे नज़रिए में हमारी इस विश्वास तथा सम्मान की चाहना का अत्यधिक हस्तक्षेप रहता है|
यहाँ पर यही निकल कर आता है कि हर व्यक्ति में विश्वास तथा सम्मान की अपेक्षा तो नित्य ही बनी रहती है पर उसमें विश्वास तथा सम्मान कर पाने कि योग्यता नहीं रहती| इसका कारण यही है कि विश्वास क्या है, सम्मान क्या है इंसान को इसकी समझ नहीं रहती| विश्वास तथा सम्मान की इस अपेक्षा के तहत काम करते हुए वह लोगों को प्रिय तथा अप्रिय तो मान लेता है पर उसे इस बात का अंदाजा नहीं रहता की ऐसा क्यूँ हो रहा है| एक और महत्त्वपूर्ण चीज़ जो देखने में आती है वह है कि हमारी प्रचलित विश्वास तथा सम्मान कि समझ के अनुसार हमारी दूसरे व्यक्ति के प्रति स्वीकृति में निरंतरता नहीं बनी रहती| जो व्यक्ति मुझे आज अच्छा लग रहा है, जरूरी नहीं रहता कि वह मुझे कल भी अच्छा लगे| इसके कारण हमारी खुद की स्वीकृति दूसरे व्यक्ति के प्रति तथा दूसरे व्यक्ति की स्वीकृति हमारे प्रति निरंतर नहीं बनी रहती| जिस व्यक्ति के साथ हमें काफी समय तक अच्छा लगा हो, जिसके साथ हमनें काफी समय तक विश्वास तथा सम्मान का अनुभव किया हो उस व्यक्ति से हमारी आसक्ति बहुत ही बढ जाती है और अगर उस व्यक्ति से हमें किसी कारणवश विश्वास तथा सम्मान की अनुभूति में अस्थिरता नज़र आये तो वह हमें बहुत ही परेशान कर देती है| ऐसा ही हम खुद भी दूसरों के साथ अनजाने में करते रहते हैं| इसके कारण परस्पर विश्वास नहीं बन पाता, परस्परता में अभय सुनिश्चित नहीं हो पाता तथा संबंधों में खींचा तानी चलती रहती है| हम खुद भी दुखी होते रहते हैं और दूसरे व्यक्ति को भी दुखी करते रहते हैं|
अगर हम ध्यान से देखें तो हमने बचपन से जो मान्यताएं इकट्ठी कर रखी होती हैं वे मान्यताएं ही हमारे स्वयं के प्रति भावः तथा हमारे दूसरों के प्रति भावः में अस्थिरता लाती रहती हैं| यही हमारे दुखों का कारण बनती है, यही हम में विरोध, प्रतिस्पर्धा, महत्वाकांक्षा, इर्ष्या, घृणा आदि दुखकारी भावों को जन्म देती है| यहाँ तक यह तो देखने में आता है की यह सब हो रहा है पर यह सब क्यों हो रहा है? और इसे ख़तम करने के लिए हमें क्या करना होगा?
मनुष्य में अस्तित्व में अपने महत्व को जानने की आशा नित्य ही बनी रहती है| हर मनुष्य अपने बारे में क्या, क्यों और कैसे जानना चाहता है| स्वयं में स्वयं के इस ज्ञान के आभाव में वह अपने महत्व को, मूल्य को सापेक्षता में, दूसरे लोगों के नज़रिए के आधार पर तथा प्रचलित मान्यताओं के आधार पर पहचानता है| जैसे ही वह ऐसा करता है वह स्वयं को बाकी लोगों से अलग मानने लगता है, अपने पराये का भेद उसमें शुरू हो जाता है| जो लोग उसको उसी आधार पर महत्त्वपूर्ण महसूस कराते हैं जिस आधार पर वह स्वयं को महत्त्वपूर्ण महसूस करता है वे उसे प्रिय हो जाते हैं तथा वह उन पर विश्वास कर पाता है तथा स्वयं में सम्मान का अनुभव करता है, तथा जो लोग उसे नहीं करा पाते वे उसे अप्रिय हो जाते हैं, वह उन पर विश्वास नहीं कर पाता, उनके साथ में सम्मान महसूस नहीं कर पाता, विरोध का भावः उनके लिए उसके मन में आ जाता है| यहीं से हिंसा की शुरुआत होती है|
स्वयं में स्वयं के महत्व को पहचानने के लिए मनुष्य को ज्ञान चाहिए| ज्ञान का अर्थ है स्वयं में स्वयं, अस्तित्व तथा अस्तित्व में स्वयं की भागीदारी का ज्ञान|
Just a question, I have often observed that people had unconditional belief on a person but at the end that person totally reacted in totally opposite manner. This is a shock where the faith is totally shattered. What should be done in such case ?
-Regards.
Rohit Agrawal
Thanks for your comment.
Thats a nice point you have made. In most of the cases we are trained for faith and assumption. The case you mentioned that we assume something because we have faith into other person and when conduct of that person is not as per our expectations then we get hurt and our faith is trashed.
This is bound to happen. Assumption, faith do not have continuity. So what should be done about it?
There is a need to self-verify the things and to KNOW. To know is what is Trust.
With Regards,
Devansh
You mean trust on yourself ? The person who trusted, had immense unconditional faith on other person finally resulted into despair. He didn’t do anything but the act of other person has left him into despair. Isn’t this tragic as he is affected because he trusted and had faith on other person ? What should be done then ?
Also how can person still trust and faith but do not assume ? Is it 100 % possible to only faith/trust and not assume ?
-Rohit
Thanks for your comment.
First I would like to mention that Trust and Faith are different things for me.
Faith is that I have assumed something to be true without that having self verified within me.
Assumption is the same thing.
Trust is when I have self-verified something and then accepted.
Now when it comes to Trust on other person and then feeling that my trust is breached, this is nothing but attachment actually. Attachment is also a kind of acceptance on the basis of some conditions and then expecting that person to keep fulfilling those conditions.
Trust which I am talking about is, unconditional feeling of acceptance for other person. When it is unconditional then there is never a condition violated and there is never a breach of trust and agony.
For this there is need to evaluate ourselves and understand true nature of a human being.
With Regards,
विश्वासों की छाँव में, ले जीवन विश्राम.
पूर्ण मूल्य तो प्रेम है, समझो पाया राम.
समझो पाया राम, जो सह-अस्तित्व को जाना.
अपनी हस्ती को उसमें पूरा पहचाना.
कह साधक रहना चाहे अपने ही गाँव में.
ले जीवन विश्राम, विश्रामों की छाँव में.
i just wana say!!!!!!!!!!
“vishwaas par vishwaas karo”!
u would get d sucess definately!
!!~!!!!!!
😀
i just wana say!!!!!!!!!!
“vishwaas par vishwaas karo”!
u would get d sucess definately!
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😀
2 gud!