विचार और विचारक

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हम सभी विचार करते हैं, कई सारी चीज़ों पर विचार! पर क्या आपने कभी यह सोचा है कि विचार करने वाला है कौन? क्या आपको पता भी है विचारक के अस्तित्व के बारे में? अक्सर तो हम ही उस विचारक को जन्म देते हैं| कभी हम सोचते हैं कि हम अच्छे हैं तो हम अच्छे बन जाते हैं और अच्छा महसूस करते हैं| कभी हम सोचते हैं की हम बुरे हैं तो हम बुरे बन जाते हैं और बुरा महसूस करते हैं| कभी कोई हमारी तारीफ कर देता है तो हम अपने आप को तीस मार्खा समझने लगते हैं, कभी कोई बुराई कर देता है तो छोटे हो जाते हैं| कभी हम सोचते हैं हम सुन्दर हैं, कभी धनवान, बलवान, समझदार, मूर्ख इत्यादि| जैसा भी हम अपने बारे में विचार करते हैं वैसी ही हम अपने बारे में अवधारणा बनाते हैं, वैसा ही हमारा विचारक के बारे में विचार बनता है|

यहाँ पर जो चीज़ देखने वाली है वह यह है की विचारक को हम ही जन्म दे रहे हैं| जैसा विचार वैसा विचारक| यहाँ तक कि हमारी विचारक के प्रति अवधारणा पल पल बदलती रहती है| जैसी हमारी मान्यताएं रहती हैं अच्छी बुरी वैसा ही हम विचारक को मानते हैं| बचपन से ही हमने कई सारी मान्यताएं बना रखी होती हैं| ये अच्छा है, वो बुरा है, ये ऐसा है, वो वैसा है आदि| जिस भी चीज़ के बारे में हम अच्छा मानते हैं उस चीज़ से अपने जुडाव से हम विचारक के बारे में अच्छी अवधारणा बनाते हैं और उस चीज़ के खुद से अलग हो जाने पर हम विचारक को छोटा महसूस करते हैं| हमारा विचारक के बारे में विचार पल पल बदलता रहता है| अगर आज मेरे पास धन है तो में विचारक को धनवान मानता हूँ और अच्छा महसूस करता हूँ| कल अगर मेरे पडोसी के पास मुझसे ज्यादा धन आ जाता है तो मैं स्वयं को दरिद्र पाता हूँ, अपने बारे में दरिद्र होने की अवधारणा बनता हूँ और विचारक को दरिद्र घोषित कर देता हूँ और बुरा महसूस करता हूँ| स्वयं को दरिद्र पाने पर में वापस से समृद्ध होने का प्रयास करने लगता हूँ|

यहाँ पर यह तो काफी साफ़ नज़र आता है कि विचार ही विचारक को जन्म दे रहा है| विचारक के स्वतंत्र अस्तित्व के बारे में हमें ज्ञान नहीं है इसीलिए हमारी विचारक के प्रति अवधारणा बदलती रहती है| अगर विचारक के प्रति वह अवधारणा हमारी मान्यताओं के अनुसार अच्छी है तो हम अच्छा महसूस करते हैं, अगर बुरी है तो हम बुरा महसूस करते हैं| यह अच्छी और बुरी मान्यताएं हमारी बचपन से लेकर अभी तक की कमाई है| जैसी कमाई, वैसा विचार, वैसी ही विचारक के बारे में अवधारणा|

यहाँ पर प्रश्न यह खडा होता है की विचारक के बारे में अवधारणा की अस्थिरता से फरक क्या पड़ता है? हमारी हमेशा यह अपेक्षा रहती है कि हम अपने बारे में अच्छा महसूस करें| यह अच्छा हमारी मान्यताओ पर निर्भर रहता है| जिस तरह की भी मान्यता के आधार पर हम विचार करते हैं विचारक के प्रति वैसी ही अवधारणा बना लेते हैं| अगर हमारी अवधारणा अच्छी हो तो हम अच्छा महसूस करते हैं और अगर बुरी है तो हम बुरा महसूस करते हैं| यह अवधारणा अलग अलग विचार के आधार पर बदलती रहती है| मान्यता के आधार पर बनी हुई अवधारणा में स्थिरता नहीं बनी रहती जिसके कारण ही हमें दुःख होता है| जब हम अपने ही विचार के आधार पर स्वयं को अच्छा नहीं पाते हैं तब हमें दुःख होता है| यहाँ पर यह देखना और जानना अत्यंत ही आवश्यक हो जाता है कि हमारे विचार और मान्यताओं का स्रोत क्या है| अक्सर हमारे विचार और मान्यताओं का स्रोत हमारा वातावरण, शिक्षा, माता पिता, अभिभावक आदि ही रहते हैं| हमारी मान्यताओं और विचारों का स्रोत बाहर ही रहता है| बाहर की किसी न किसी चीज़ पर निर्भर ही रहता है| जब तक ये मान्यताएं और विचार बाहर के किसी भी स्रोत पर इस तरह से निर्भर रहेंगे तब तक हमारी विचारक के प्रति मान्यता में अस्थिरता बनी ही रहेगी और हमें दुःख होता ही रहेगा| यहाँ पर स्वतंत्र विचार कि आवश्यकता महसूस होती है| स्वतंत्र विचार सही कि समझ के बिना नहीं हो सकता| सही कि समझ के लिए हमें ज्ञान चाहिए| सही ज्ञान से ही सही मान्यता, सही मान्यता से ही स्वतंत्र विचार, स्वतंत्र भावः संभव है| सही ज्ञान का अर्थ ही है विचारक तथा संपूर्ण अस्तित्व के बारे में सही ज्ञान| जीवन तथा अस्तित्व का ज्ञान ही ज्ञान का अर्थ है|

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