आकर्षण संबंध नहीं है

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हमारे रोजाना के जीने में देखने में आता है कि हम कई लोगों से बात चीत करते हैं, कई लोगों के साथ उठते बैठते हैं, मिलते हैं| कई लोग हमें अच्छे लगते हैं, कई बुरे| अच्छे लगने वाले लोगों में भी कई लोग ज्यादा अच्छे लगते हैं, कई लोग कम और ऐसा ही बुरे लगने वाले लोगों के साथ में भी होता है| अक्सर हम लोगों को एक मापदंड पर मापते हैं और उसके आधार पर वे हमें अच्छे बुरे लगते हैं| सभी लोगों ने अपने खुद के अलग अलग मापदंड बना रखे होते हैं| किसी को कोई व्यक्ति अच्छा लगता है किसी को कोई दूसरा और ऐसा तो अक्सर देखने में आता है कि कोई व्यक्ति किसी एक व्यक्ति को अच्छा लगता है और किसी दूसरे व्यक्ति को नहीं| जो लोग हमारे मापदंड पर खरे उतरते हैं हम उनकी तरफ आकर्षित होते हैं और जो नहीं उतरते उनसे हम प्रत्याकर्षित होते हैं| अगर हम ध्यान से देखें तो यह देखने में आता है कि हमारे संबंधों में आकर्षण और प्रत्याकर्षण का अत्यधिक प्रभाव रहता है| बल्कि मुझे यह कहना चाहिए कि अभी जिसे हम संबंध कहते हैं उसका आधार आकर्षण, प्रत्याकर्षण ही बना रहता है| यही आकर्षण, प्रत्याकर्षण हमारे लोगों को तोलने के मापदंड का आधार बना रहता है|

यहाँ पर इस आकर्षण, प्रत्याकर्षण को समझना जरूरी हो जाता है| अगर हम उन सब चीज़ों की एक लिस्ट बनाएं जिनकी तरफ हम आकर्षित होते हैं तो उनमें कई सारी चीज़ें देखने में आती हैं| दूसरे व्यक्ति के विचारों का हमारे विचारों से मिलना, दूसरे व्यक्ति का हमारे ऊपर विश्वास करना, दूसरे व्यक्ति के द्वारा हमारा सम्मान किया जाना, दूसरे व्यक्ति के लिए मेरा मूल्यवान होना, उसके द्वारा मुझ पर ध्यान दिया जाना, उसके साथ में मुझे आराम महसूस होना, उसका शारीरिक रूप से सुन्दर होना, उसका ऊंचे पद पर स्थापित होना, उसका समाज में प्रतिष्ठित होना, उसका धनवान होना, उसका बलवान होना, दूसरे व्यक्ति का समझदार होना, इत्यादि| और भी कई सारी चीज़ें हो सकती हैं जो मेरे दूसरे व्यक्ति की तरफ आकर्षित होने के लिए जिम्मेदार हों| जो भी चीज़ें मुझे दूसरे व्यक्ति की तरफ आकर्षित करती हैं, वे लोगों को तोलने के लिए मेरे मापदंड का आधार बनती हैं| अक्र्सर हमें यह पता नहीं होता कि हम किन चीज़ों कि तरफ आकर्षित होते हैं, तो हमारा हमारे मापदंड के आधार के प्रति सजग होना तो बहुत ही दूर कि बात है| खुद में होने वाले आकर्षण, प्रत्याकर्षण के आधार पर मैं लोगों को अच्छा बुरा ठहराता हूँ|

यहाँ पर अगर और ध्यान से देखा जाए तो यह देखने में आता है कि किसी व्यक्ति के प्रति आकर्षण के मूल में दो चीज़ें देखने में आती हैं:-
१. दूसरे व्यक्ति से मिलने वाले इन्द्रिय अस्वादन का मुझे अच्छा लगना| जैसे दूसरे व्यक्ति का शारीरिक रूप से दिखने में सुन्दर होना, इत्यादि|
२. दूसरे व्यक्ति से मेरे किसी भी तरह के जुडाव के आधार पर मेरे मूल्य में वृद्धि का मुझे महसूस होना या स्वयं में विश्वास, सम्मान का अनुभव होना| जैसे किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति से मेरे जुडाव के आधार पर मुझे अच्छा लगना, किसी रूपवान व्यक्ति के सान्निध्य में अच्छा लगना, किसी धनवान व्यक्ति के सान्निध्य को पाकर स्वयं में अच्छा महसूस करना, किसी ऐसे व्यक्ति के सान्निध्य को पा कर के अच्छा लगना जो मुझे समझता है, मुझ पर विश्वास करता है, मेरा सम्मान करता है, इत्यादि|

आकर्षण के मूल में ये दो ही चीज़ें देखने में आती हैं| इसमें भी अगर और ध्यान से देखें तो यह दिखता है कि दूसरे तथ्य के आधार पर होने वाले आकर्षण में ज्यादा प्रबलता है| जैसे किसी रूपवान व्यक्ति कि तरफ आकर्षित होने पर अगर हमें पता चले कि उसके विचार, कार्य, व्यवहार हमारी तरफ अच्छा नहीं है तो हमें उससे प्रत्याकर्षण होने लगता है| उसी तरह कोई व्यक्ति अगर शारीरिक रूप से सुन्दर नहीं है पर उसके सान्निध्य में हमें अच्छा महसूस होता है, वह व्यक्ति हम पर विश्वास करता है, हमारे बारे में अच्छा सोचता है, हमारा सही मूल्यांकन करता है तो हमें अच्छा लगता है| ऐसे में शरीर कि कुरूपता कि ओर ध्यान नहीं जाता| इससे यह सिद्धः हो जाता है कि मनुष्य विश्वास, सम्मान पूर्वक जीना चाहता है| मनुष्य में भावः पक्ष प्रधान रहता है तथा नित्य प्रभावी रहता है| मनुष्य में विश्वास, सम्मान पूर्वक जीने कि यह चाहना नित्य बनी रहती है| जहाँ पर भी मनुष्य को यह विश्वास सम्मान की आवश्यकता पूरी होती हुई नज़र आती है, वह उस तरफ आकर्षित होता है और जहाँ से पूरी होती हुई नज़र नहीं आती वह वहां से प्रत्याकर्षित होता है|

यहाँ पर ऐसा देखने में आता है कि मनुष्य अपने आप को अक्सर अपने आस पास के लोगों कि नज़रों से देखता है| अगर उसे ऐसा लगता है कि उसके आस पास के लोग उसे अच्छा देखते हैं तो वह अच्छा महसूस करता है, उन लोगों कि तरफ आकर्षित होता है तथा अगर उसे लगता है कि उसके आस पास के लोग उसे अच्छा नहीं देखते, उसके बारे में अच्छा नहीं सोचते तो वह उनसे प्रत्याकर्षित होता है, उसे उनके साथ में अच्छा नहीं लगता| यहाँ पर से यही समझ में आता है कि अभी संबंध का आधार आकर्षण, प्रत्याकर्षण ही बना रहता है| मनुष्य अपने मूल्य को, दूसरों के उसके प्रति नज़रिए के आधार पर पहचानता है| जो लोग उसे मूल्यवान महसूस कराते हैं वह उनकी तरफ आकर्षित होता है तथा जो उसे नहीं कराते वह उनसे प्रत्याकर्षित होता है| जिन लोगों के प्रति वह आकर्षण महसूस करता है तथा जो लोग उसे मूल्यवान होने का भावः महसूस कराते हैं वह उन्हें अपने संबंधियों के रूप में स्वीकारता है तथा अन्य को नहीं स्वीकारता है|

इस तरह से यहाँ पर यह साफ़ देखने में आता है कि अभी संबंध का आधार आकर्षण, प्रत्याकर्षण ही बना रहता है| यहाँ पर एक और जो काफी महत्त्वपूर्ण चीज़ नज़र आती है वह यह है कि आकर्षण के आधार पर संबंध में स्वीकृति के भावः की निरंतरता नहीं बनी रहती| यह इस तरह से देखा जा सकता है कि आकर्षण के मूल में या तो संवेदना है या मूल्य में वृद्धि का अनुमान है| संवेदना खुद में ही निरंतर नहीं बनी रहती और दूसरे व्यक्ति के नज़रिए के आधार पर मूल्य में वृद्धि की स्थिरता नहीं बनी रहती| यह ऐसे देखा जा सकता है कि दूसरे व्यक्ति के नज़रिए का मेरे प्रति अच्छा होने से जो मुझे अच्छा लगता है वह निरंतर नहीं बना रहता भले ही दूसरे व्यक्ति का नजरिया मेरे प्रति वैसा ही बना रहे| कुच्छ समय के बाद मुझे उससे भी कुछ अधिक की आवश्यकता महसूस होती है| जब तक मुझे दूसरे व्यक्ति की तरफ आकर्षण से सुख मिलता रहता है तब तक मेरे मन में उसके प्रति संबंध का भावः बना रहता है, पर क्यूंकि आकर्षण खुद में स्थिर नहीं बना रहता तो उसके आधार पर संबंध में स्वीकृति के भावः की स्थिरता नहीं बनी रहती| देखने में आता ही है कि लड़के लड़किया शादी के पहले एक दूसरे के सानिध्य में काफी अच्छा महसूस करते हैं और शादी के बाद कुछ समय बिता लेने पर उन्हें उतना अच्छा महसूस नहीं होता| उन्हें कुछ और ज्यादा कि जरूरत महसूस होती है|

यहाँ पर यह सिद्धः हो जाता है कि आकर्षण संबंध का आधार नहीं हो सकता क्यूंकि उसके आधार पर संबंध में स्वीकृति के भावः कि स्थिरता नहीं बनी रहती| जबकि संबंध में स्वीकृति का भावः अनिवार्य है| बल्कि यह भी देखने में आता है कि जब हम में अस्वीकृति का भावः आता है दूसरे व्यक्ति के प्रति तो हम परेशान ही होते हैं| परेशानी या दुःख किसी को सहज रूप से स्वीकार नहीं होता| यहाँ पर संबंध और स्वीकृति को समझने की आवश्कता महसूस होती है| संबंध में दूसरे व्यक्ति के प्रति स्वीकृति का आधार जब तक मानवत्व नहीं होता तब तक उसमें स्थिरता नहीं बनी रहती| मानवत्व की समझ लिए हमें स्वयं को समझने की आवश्यकता है| स्वयं की समझ के विकास के फलस्वरूप ही स्वयं में मानवत्व तथा मानव संबंध में स्वीकृति की समझ का विकास संभव है| यही स्वयं में सुख तथा संबंधों में उभय तृप्ति का आधार हो सकता है| स्वयं में समाधान ही सुख तथा संबंधों में समाधान की अभिव्यक्ति ही उभय तृप्ति है| समाधान का अर्थ है, स्वयं में स्वयं तथा अस्तित्व का ज्ञान|

2 responses »

  1. @Unmukt:

    Thanks for the comment 🙂
    I have written few more articles in hindi which you can find in my older blogs.
    Keep reading and commenting 🙂

    PS: If you allow me then I would like to know more about you.

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