हमारे ज्यादातर प्रयास विशेष होने के लिए ही रहते हैं| हम कुछ ना कुछ विशेषता की चादर ओढे रहना चाहते हैं| विशेषता से मेरा तात्पर्य है “मैं बाकी लोगों से कुछ अलग हूँ, मूल्यवान हूँ”, स्वयं में यह भाव| बाकी लोगों से अलग होने पर मैं स्वयं मे अच्छा महसूस करता हूँ| उस विशेषता के आधार पर मैं अपनी पहचान बनाता हूँ| जैसे अगर मैं शारीरिक रूप से सुंदर हूँ तो मैं सुन्दरता के आधार पर स्वयं को पहचानता हूँ| मुझे लगता है कि मेरे पास एक ऐसी चीज़ है जिसके कारण बाकी लोग मुझ पर ध्यान देंगे, मुझे अच्छा देखेंगे, मुझसे जुड़ना चाहेंगे| इसी विशेषता के आधार पर मैं स्वयं के मूल्य को पहचानता हूँ| अगर हम सभी अपने आप को देखें तो यह देखने में आता है कि हम सभी किसी ना किसी विशेषता की चादर ओढे ही रहते हैं| उस चादर के उघड जाने पर हम स्वयं को नग्न महसूस करते हैं और हमें लगने लगता है कि हमारे आसपास के सभी लोग हमारी नग्नावस्था को देख कर हम पर अट्टहास कर रहे हैं| कई बार तो ऐसा भी होता है कि अगर हमें इस बात का अनुमान पहले ही लग जाए कि हमारी विशेषता की चादर उघड जाने वाली है तो हम उस भय के मारे आत्महत्या तक के लिए उतारू हो जाते हैं, जैसे एक्साम मे फ़ैल हो जाने के भय से या सोसायटी मैं नाक कट जाने के भय से आत्म हत्या कर लेना| इतना महत्व रखती है यह विशेषता की चादर|
अगर हम थोड़ा और ध्यान से देखें तो यह दीखता है कि हम कई सारी विशेषताओं कि चादरें ओढे रहते हैं| जैसे मैं सुंदर हूँ, मैं ऊंचे पर विराजमान हूँ, मैं धनवान, मैं बलवान हूँ, मैं बुद्धिमान हूँ, मैं कई सारे लोगों के द्वारा जाना जाता हूँ, मझे लोग अच्छा देखते हैं, मैं बातें काफ़ी अच्छी कर लेता हूँ, इत्यादि| जितनी ज्यादा चादरें हम ओढे रहते हैं, हमारा आत्मविश्वास उतना ही अधिक बढ जाता है| हम स्वयं में उतना ही अधिक अच्छा महसूस करते हैं| किसी चादर के उघड जाने पर हम बाकी चादरों का सहारा लेकर अपने आत्मविश्वास को बनाये रखते हैं, परन्तु कुछ समय के लिए तो हमारा आत्मविश्वास किसी भी चादर के उघड जाने पर हिल ही जाता है| किसी भी चादर के उघड जाने पर हम दुखी तो होते ही हैं|
कई बार ऐसा भी होता है कि किसी विशेषता कि चादर को हमने बहुत ही लंबे समय से ओढ़ रखा हो तो हमारी उस चादर के प्रति आसक्ति बहुत ही प्रबल हो जाती है| ऐसे में अगर वो विशेषता की चादर हमसे अलग हो जाए या किसी भी कारण से उघड जाए तो हमें लगता है कि हम मिटटी में ही मिल गए| हमें लगने लगता है की हमारी कोई वेल्यु ही नहीं रह गई| यह स्थिति वही नग्न हो जाने जैसी होती है जिसमें हमें लगने लगता है कि बाकी सब हमारे आसपास के लोग हमें ही देख रहे हैं, हम पर अट्टहास कर रहे हैं| बाकी सब लोग हमारे बारे में क्या सोचेंगे यह तथ्य हमें बहुत प्रताडित करने लगता है| ऐसे में अगर हमें किसी और विशेषता की चादर का सहारा मिल जाए तो वह हमें बहुत ही आराम दे देती है| यहाँ तक की किसी अकेले आदमी का सहारा भी ऐसे समय पर बहुत ही मूल्यवान मालूम होता है| जैसे एक्साम में अच्छे नंबर ना आने पर बच्चे को बोलना कि तुम्हें विषय तो आता ही है नंबर नहीं आए तो क्या हो गया| एक चादर उघड जाने पर हम किसी और चादर का सहारा ले लेते हैं|
अगर हम ध्यान से देखें तो यही समझ में आता है कि विशेषता कि चादर ओढ़ने के मूल में स्वयं के मूल्यवान होने जाने या माने जाने की आशा है| यहाँ पर यही देखने में आता है कि किसी विशेषता कि चादर ओढ़ने पर हमें जो स्वयं में मूल्यवान होने का जो भाव महसूस होता है उसके मूल में उस विशेषता के साथ में हमारे जुड़ जाने पर दूसरों के नज़रिए का हमारे प्रति अच्छा हो जाने का जो हमने अनुमान लगाया रहता है, वही है| जैसे, “अगर मैं धनवान हो गया तो लोगों का नजरिया मेरे प्रति अच्छा होगा, लोग मुझे अच्छा और ऊंचा देखेंगे”|
यहाँ पर एक और जो चीज़ देखने में आती है वह यह है कि विशेषता से मिलने वाले सुख या विश्वास कि निश्चितता, स्थिरता और निरंतरता नहीं बन पाती| इसके मूल मे कारण यही है कि हम किसी विशेषता से जुड़ने के लिए तभी प्रेरित होते हैं जब हमें उससे जुड़ कर अपने मूल्य में वृद्धि का अनुमान हो| मूल्य में वृद्धि का आधार लोगों में उस विशेषता के प्रति प्रचलित मान्यता रहता है| जैसे सोना| अगर सोना आजकल प्रचलित है और सोने के गहने पहनने वालों को ऊंची नज़रों से देखा जाता है तो ज्यादा से ज्यादा लोग सोने के गहने बनवाने और पहनने के लिए प्रेरित होते हैं| उससे उन्हें स्वयं में सुख, विश्वास का अनुभव होता है| पर उस सुख, विश्वास के निरंतर बने रहने के लिए निम्न शर्तें पूरी होना जरूरी होगा:-
१. सोने के उस विशेष प्रकार के गहने के प्रति जो हमने पहना हुआ है, लोगों का नज़रिया बरक़रार रहे और वे मुझे वह ज़ाहिर करते रहे|
२. उनके नज़रिए के बने रहने से मुझे जो आनंद प्राप्त हो रहा है उसकी मुझ में स्थिरता, निरंतरता बनी रहे|
अगर हम ध्यान से देखें तो ये दोनों ही शर्तें पूरी नहीं हो पाती| जैसे ही कोई व्यक्ति मुझसे अच्छा गहना पहन कर उनके सामने आता है वे उसे ज्यादा अच्छा देखने लगते हैं और मेरी वेल्यु उनकी नज़रों में कम हो जाती है| या फिर अगर मार्केट में सोने की ही वेल्यु कम हो जाए क्यूंकि उससे अच्छा कोई और धातु मार्केट में आ गया है तो भी मेरी वेल्यु घट जाती है| और भी कई सारी चीज़ें हो सकती हैं जो लोगों का मेरे गहने के प्रति नज़रिए को पहले से कम अच्छा कर दें| यहाँ पर यही देखने में आता है कि लोगों का नज़रिया या किसी वस्तु के प्रति उनकी मान्यता की स्थिरता, निरंतरता नहीं बनी रहती|
दूसरी चीज़ जो देखने में आती है वह यह है कि किसी वस्तु के प्रति हमारी ख़ुद की मान्यता भी स्थिर नहीं बनी रहती| अगर हमारे आस पास के लोग रोज रोज भी हमारे घर आ कर हमारे गहने की तारीफ करते भी रहे तो भी हम थोड़े दिनों बाद उस तारीफ से उतना आनंद प्राप्त नहीं कर पते, जितना की हम पहले कर रहे थे| हमें अब इस बात की आवश्यकता महसूस होती है की लोग हमारी थोडी और ज्यादा तारीफ करें, नए तरीके से तारीफ करें, हमारे ऊपर नए तरीके से ध्यान दें| फिर थोड़े दिनों बाद हम उनके उस नए तरीके से भी बोर होने लगते हैं|
यहाँ पर यह सिद्ध हो जाता है कि विशेषता से मिलने वाले सुख/विश्वास कि निश्चितता, स्थिरता और निरंतरता नहीं है| जबकि मनुष्य सुख, विश्वास की स्वयं में निश्चितता, स्थिरता और निरंतरता चाहता है|
परन्तु किसी विशेषता की चादर के बिना हम में हमारे मूल्य के प्रति सजगता के आभाव में हम किसी न किसी विशेषता की चादर को निरंतर ओढे रखना चाहते हैं| और तो और क्यूंकि उससे मिलने वाले सुख, विश्वास की निरंतरता नहीं बनी रहती इसलिए हम भी निरंतर और नई नई चादरें ओढ़ने के लिए प्रेरित होते रहते हैं| एक चादर की मान्यता कम हो जाने पर हम उसमें कुछ और डिजाईन बनवाने की कोशिश करते हैं, उस पर नया रंग चढवा लेते हैं या पूरी की पूरी चादर ही बदल डालते हैं| अपने मूल्य को बनाये रखने के लिए या उसे और अधिक बड़ा लेने के लिए ऐसा कर लेना एक आवश्यकता के रूप में बना रहता है जिसका कोई और विकल्प दिखाई भी नहीं देता| अगर हम स्वयं में अपने विश्वास के भाव को ध्यान से देखें तो यह साफ़ दीखता है की वह किस तरह एक वस्तु से दूसरी वस्तु की तरफ़ भागता रहता है| किस तरह नए नए तरीके से वह अपने आप को सुनिश्चित करने के लिए निरंतर प्रयासरत रहता है| यही सिद्ध करता है उस विश्वास के भाव या सुख की निरंतर आवश्यकता को|
यहाँ पर इतना तो बहुत ही आराम से देखने में आता है कि विशेषता से मिलने वाले सुख, विश्वास के निरंतर ना होने पर हमें जो उसको निरंतर बनाये रखने के लिए कार्य करना पड़ता है वह अपने आप में ही बहुत दुखदायी है| जबकि हर इंसान निरंतर सुख की प्रत्याशा रखता है| यहाँ पर आकर हमें स्वयं में सुख, विश्वास की निरंतर आवश्यकता का आभास तथा उसको निरंतर सुनिश्चित करने के लिए समाधान की आवश्यकता महसूस होती है| यहाँ पर यही समझ में आता है कि स्वयं में स्वयं के निरपेक्ष मूल्य के ज्ञान के आभाव में ही हम किसी ना किसी विशेषता के आधार पर स्वयं के मूल्य को पहचानने का प्रयास करते हैं, जो कि विफल होता रहता है| स्वयं में स्वयं के मूल्य के प्रति निर्भ्रमता या ज्ञान के लिए प्रयास ही श्रेष्ठता के लिए प्रयास है तथा स्वयं में उस ज्ञान का होना ही श्रेष्ठता है|
इस पूरे विश्लेषण से यही सिद्ध हो जाता है कि स्वयं में स्वयं तथा अस्तित्व के प्रति ज्ञान का आभाव ही स्वयं में दुखों का कारण है| स्वयं में स्वयं का ज्ञान ही पूर्ण समाधान, सुख तथा विश्वास का एक निश्चित आधार है| यही श्रेष्ठता है|