जब भी मेरे मन में मेरे आस पास के किसी व्यक्ति के प्रति संदेह उत्पन्न होता है, तो मैं परेशान हो जाता हूँ| संदेह मेरे मन मे तब उत्पन्न होता है जब मुझे ऐसा लगता है की दूसरे व्यक्ति का आचरण अथवा विचार मेरे प्रति बदलने लगा है| जब मेरे मन में संदेह आता है तो वह मेरी आंखों पर एक काला चश्मा लग जाने जैसा होता है| जिस व्यक्ति के प्रति संदेह उत्पन्न होता है उसके पूरे आचरण, विचार, कार्य, व्यवहार को मैं उस काले चश्मे के माध्यम से देखता हूँ और काला पाता हूँ| उसकी हर गतिविधि पर संदेह करता हूँ और दुखी होता हूँ| मन मे उस व्यक्ति के प्रति कई बुरे विचार आने लगते हैं| काम करते करते उस व्यक्ति का ध्यान आ जाता है और मुझे परेशान करता है| मेरा आचरण और विचार भी उस व्यक्ति के प्रति धीरे धीरे बदलने लगता है| धीरे धीरे मे उस व्यक्ति से दूर जाने लगता हूँ और उस व्यक्ति से सम्बन्ध का भाव मेरे मन मे कम होने लगता है| उस संदेह की भवनावश कुछ ही समय मे मैं उस दूसरे व्यक्ति को अपने विरोधी की तरह देखने लग जाता हूँ|
जब मैंने स्वयं में ऐसा पाया तो उसके कारण को जांचने का मैंने प्रयास किया| मैंने यह जानने का प्रयास किया की मेरे अन्दर ऐसा हो क्यों रहा है? कुछ आत्मावलोकन करने पर दो कारण मुझे कुछ समझ में आए| पहला, मैं स्वयं को उस तरह से देखता हूँ जैसा मुझे मेरे आस पास के लोग देखते हैं| अपने आस पास के लोगों की नज़रों से मैं स्वयं को देखता हूँ| जब वे मुझे अच्छा देखते हैं, या फिर जब वे मुझे वैसा देखते हैं जैसा मैं ख़ुद अपने आप को देखता हूँ तो मुझे अच्छा लगता है, अन्यथा मुझे अच्छा नहीं लगता| उनके किए मूल्यांकन के अनुसार जब मैं स्वयं को स्वयं के ही किए मूल्यांकन से कम पाता हूँ तो मुझ मे हीनता की भावना आ जाती है| और जब मे स्वयं को स्वयं के ही किए मूल्यांकन से ज्यादा पाता हूँ तो मुझ मे अंहकार की भावना पनपने लगती है| हीनता अथवा अंहकार दोनों ही मेरे दुःख का कारण बनते हैं|
किसी भी सम्बन्ध मे मेरी मेरे संबंधियों से ऐसी अपेक्षा रहती है की वे मुझे स्वीकार लें और स्वीकार ही रहे| मैं किसी भी संबंध मे निरपेक्ष स्वीकृति की अपेक्षा रखता हूँ| जबकि मुझे मैं अपने संबंधियों को निरपेक्ष रूप से स्वीकार कर लेने की अहर्ता नहीं है| निरपेक्ष स्वीकृति तभी सम्भव है जब उसका आधार निश्चित,समान तथा निरंतर हो| शायद ऐसे किसी आधार को मैं अभी अच्छे से पहचान नहीं पाया हूँ| गौर करने पर मैंने पाया की निरपेक्ष स्वीकृति की इस अपेक्षा में मेरी ऐसी भी अपेक्षा रहती है की मुझे उस तरह से स्वीकार किया जाए जैसे मैं चाहता हूँ| जैसा मैं स्वयं को देखता हूँ मुझे वैसा देखा जाए, और मुझ मे बदलाव के साथ साथ अन्य लोगों का मुझे देखने का नज़रिया भी बदलता रहे| जब मुझे वैसा देखा जाता है तो मुझे निरपेक्ष स्वीकृति महसूस होती है अन्यथा नहीं होती और मुझ मे हीन भावना बलवती होने लगती है| इतनी अपेक्षाएं रख रहा हूँ मैं और अन्य लोगों की अपेक्षाओं को मैं अक्सर उनकी गैर जिम्मेदारी अथवा परतंत्रता कह दिया करता हूँ|
दूसरा कारण जो मुझे समंझ में आता है वह है, जब में दूसरे व्यक्ति की चाहना पर संदेह करता हूँ तब मैं परेशान हो जाता हूँ| जब भी मुझे ऐसा लगता है की दूसरा व्यक्ति मुझे दुःख पहुचना चाहता है, तो मेरे मन मैं बना उस व्यक्ति के लिए विरोध का भाव मुझे परेशान करता है| जब भी मुझे ऐसा लगता है की मेरे दुखो के लिए अन्य जिम्मेदार हैं, मैं परेशान हो जाता हूँ, क्रोध मुझे मैं जन्म लेने लगता है और मुझे परेशान करने लगता है|
विश्वास तथा सम्मान की जो परिभाषाएं सुनने मैं आती हैं वह हैं,
विश्वास: स्वयं/दूसरे की चाहना के प्रति पूर्ण आश्वस्ति कहलाती है, विश्वास|
सम्मान: स्वयं का स्वयं के ही द्वारा किया गया सही सही मूल्यांकन कहलाता है, सम्मान|
इन परिभाषाओं के अनुसार, विश्वास के साथ सम्मान स्वतः ही है, क्यूकि स्वयं का मूल्यांकन स्वयं की चाहना तथा मूल्य का मूल्यांकन ही है|
शायद समझ की इसी कमी के कारण मुझ मैं दीनता, हीनता, अंहकार तथा अन्य पीडायें जन्म ले रही हैं| शायद अभी तक पूरी तरह से मैंने अपना मूल्यांकन सही से किया नहीं है|