प्रतियोगी या सहयोगी?

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अक्सर ऐसा होता है कि किसी व्यक्ति के हमारे ऊपर कुछ टिपण्णी कर देने पर हम परेशान हो जाते हैं, उस व्यक्ति पर संदेह करने लगते हैं| संदेह की भावना हमें तो परेशान करती ही है, साथ ही साथ हमें वह व्यक्ति भी अपने विरोधी अथवा प्रतियोगी की तरह दिखने लग जाता है| अक्सर ऐसा तब होता है जब हमारे आसपास का कोई व्यक्ति हमें कुछ ऐसी बात कह देता है जिसकी अपेक्षा हम उस व्यक्ति से नहीं रखते या जब दूसरे व्यक्ति को हमने पहले से ही अपने प्रतियोगी या विरोधी की तरह स्वीकारा रहता है| जब हम ऐसा कुछ सुनते हैं तो अक्सर हमारे मन में संदेह उत्पन्न हो जाता है, की पता नहीं उस व्यक्ति के मन में मेरे प्रति क्या अवधारणा बनी हुई है?, पता नहीं क्या हो गया?, ऐसी तो इस व्यक्ति से अपेक्षा नहीं थी!, वह व्यक्ति मुझे परेशान करना चाहता है, इत्यादी| यह संदेह की भावना धीरे धीरे मेरे मन में दूसरे व्यक्ति के प्रति विरोध की भावना को जन्म देती है और फिर वह विरोध का भाव मुझे परेशान करते रहता है, मेरी उर्जा खाते रहता है|

यहाँ पर प्रश्न यह खड़ा होता है कि दूसरे व्यक्ति की टिपण्णी से मुझे परेशानी क्यों हो रही है? ऐसा देखने में आता है कि जब कोई व्यक्ति मुझे कुछ कहता है, तब उसके केवल दो ही आशय हो सकते हैं, या तो वह मेरे भले के लिए, मुझे कुछ समझाने के लिए मुझसे कुछ कह रहा है या फिर वह वह मुझे नीचा दिखाने के लिए या मुझे परेशान करने के लिए कुछ कह रहा है| या तो वह मुझे कुछ समझा कर सुखी करना चाहता है या फिर मुझे ताना मारकर दुखी करना चाहता है| जब मुझे ऐसा लगता है कि सामने वाला व्यक्ति मुझे समझाने के लिए कह रहा है, मेरी भलाई के लिए कह रहा है, तो मैं परेशान नहीं होता, बल्कि मैं उसकी बात ध्यान से सुनता हूँ और अपनी गलतियों को अगर मैं कुछ पकड़ पाता हूँ तो मानता हूँ, स्वीकार कर लेता हूँ तथा दूसरे व्यक्ति को मैं अपने सहयोगी की तरह स्वीकारता हूँ|

जब मुझे ऐसा लगता है कि दूसरा व्यक्ति मुझे ताना मारने के लिए, मुझे दुखी करने के लिए मुझसे कुछ कह रहा है तो मैं परेशान हो जाता हूँ, उसकी कही बात के आधार पर मैं स्वयं का मूल्यांकन करके स्वयं को नीचा पाता हूँ, हीनता का भाव मेरे अन्दर जन्म लेने लगता है तथा मैं दूसरे व्यक्ति को अपने विरोधी अथवा प्रतियोगी की तरह देखने लग जाता हूँ| विरोध अथवा प्रतियोगिता का भाव मेरे अन्दर काफ़ी परेशानी को जन्म देता है और मुझे दूसरे व्यक्ति को नीचा दिखाने तथा परेशान करने के नए नए तरीके तथा वाद विवाद में जीतने के नए तरीके इजाद करने के लिए प्रेरित करता है| काफ़ी समय और उर्जा इसमें नष्ट होती है और मुझे परेशान करती है|

यहाँ पर ध्यान देने वाली चीज़ जो मुझे नज़र आती है, दूसरा व्यक्ति मुझे परेशान करने की चेष्टा तभी करता है जब वह ख़ुद ही परेशान हो या मुझे उसके प्रतियोगी अथवा विरोधी की तरह देखता हो| मैं स्वयं में यह देख पाता हूँ की जब मैं ख़ुद परेशान होता हूँ तो मेरा व्यवहार दूसरों के प्रति बदल जाता है, कई बार मैं दूसरों को अनजाने मैं अपनी परेशानिवश परेशान भी कर देता हूँ| जब मैं दुखी होता हूँ तो दूसरों को मैं सुखी नहीं कर पाता और उनको ना चाहते हुए भी दुखी कर बैठता हूँ| दूसरी चीज़ जो मुझे नज़र आती है वह है की जब मैं दूसरे को अपने विरोधी अथवा प्रतियोगी की तरह देखता हूँ तब भी मैं दुखी ही होता हूँ| मेरे मन में हर समय यही विचार चल रहा होता है की किस तरह से मैं उस व्यक्ति से किसी भी प्रतियोगिता मैं जीत जाऊँ, किस तरह से मैं उस व्यक्ति को नीचा दिखाऊँ, किस तरह से मैं उस व्यक्ति को परेशान करूँ| यहाँ पर मैं यह देख पाता हूँ की विरोध अथवा प्रतियोगिता का भाव किस तरह से मुझे परेशान करता है, किस तरह से मेरे विचारों को हर समय घेरा रहता है, किस तरह से मुझ मे असुरक्षा का भाव उत्पन्न करता है और किस तरह से मुझे पीड़ा देता है| जब मैं ख़ुद दुखी होता हूँ तो दूसरों को दुखी ही करता हूँ| जब मे ख़ुद सुखी होता हूँ तब ही मैं दूसरों को सुखी कर पाता हूँ| उसी तरह जब दूसरा व्यक्ति ख़ुद दुखी होता है तो वह मुझे सुखी नहीं कर पाता|

यहाँ पर ऐसा देखने मे आता है की मेरी चाहना तो दूसरे को हमेशा सुखी करने की ही होती है पर जब मैं स्वयं में परेशान होता हूँ तो दूसरे को सुखी नहीं कर पाता उल्टा दुखी कर बैठता हूँ| उसी तरह दूसरे की चाहना भी मुझे सुखी करने की ही है परन्तु जब वह ख़ुद में ही परेशान होता है तब वह मुझे भी सुखी नहीं कर पाता उल्टा दुखी कर बैठता है| जब दूसरा व्यक्ति मुझे दुखी कर बैठता है तब मैं अगर उससे यह अनुमान लगता हूँ की वह मुझे दुखी करना चाहता था, तो में भी परेशान हो जाता हूँ तथा बदले या विरोध का भाव मुझ में आ जाता है| पर अगर मैं यह समझ पाता हूँ की वह मुझे दुखी नहीं करना चाहता था बल्कि वह अभी ख़ुद दुखी है इसलिए मुझे सुखी नहीं कर पा रहा है तो मेरा आराम बना रहता है और में उस व्यक्ति को अपने विरोधी की तरह नहीं देखता, मेरे मन में विरोध का भाव नहीं आता, मुझे परेशानी नहीं होती, बल्कि मैं उस व्यक्ति के प्रति जिम्मेदार महसूस करता हूँ तथा उसकी समझ विकसित करने में भागीदारी करता हूँ| दूसरा व्यक्ति भी ऐसा ही करता है|

दूसरे व्यक्ति की चाहना के प्रति पूर्ण आश्वस्ति कहलाती है, विश्वास| विश्वास का आभाव ही संबंधों में तनावों का कारण है|

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