एक बार एक सन्यासी गौतम बुद्ध के पास आया| यह सन्यासी अभी नया नया सन्यासी हुआ था| पहले वह गृहस्थ था| इस सन्यासी ने बुद्ध से स्वयं को उनके द्वारा शिष्य के रूप में स्वीकारे जाने का अनुरोध किया| बुद्ध मान गए| सन्यासी भले ही नया नया सन्यासी हुआ था पर बुद्ध के प्रति उसके मन में काफी श्रद्धा और समर्पण का भाव था| बुद्ध के द्वारा दिए जाने वाले दिशा निर्देशों के प्रति उसके मन में काफी सम्मान था तथा वह उन्हें काफी निष्ठा से पालन करता था| बुद्ध की कही गयी किसी बात को वो नकार दे, ऐसा वो सपने में भी नहीं सोच सकता था| कुछ दिन वह बुद्ध के साथ में रहा, बुद्ध को देखते परखते रहना, उनसे प्रेरणा लेते रहना इत्यादि में वह संलग्न रहता| बुद्ध भी उसके कार्य, व्यवहार, विचार, संस्कार को बिना उसके भान के पढते रहे|
एक दिन बुद्ध ने इस सन्यासी को अपने पास बुलाया और कहा, “पास ही के एक गांव में एक महिला रहती है, उसका नाम कमला है, कोई भी तुम्हें उसके घर का पता बता देगा, उसके घर जाओ भिक्षा मांगने”| सन्यासी मान गया और चल दिया कमला के घर| भरी धूप थी, गांव दूर था, घर का भी निश्चित पता नहीं था| लोगों से पूछते पुछाते कुछ घंटों के बाद वह कमला के घर पर पहुच गया| काफी थक चुका था अब तक वह| इतनी लम्बी यात्राएं पैदल करने की उसे अभी आदत नहीं थी| नया नया सन्यासी जो हुआ है गृहस्थ से वह|
कमला के घर का दरवाज़ा उसने खटखटाया| अन्दर से कुछ देर में आवाज़ आई, “वहीँ रुको अभी आती हूँ मैं भिक्षा लेके”|
सन्यासी ने सोचा इस महिला को कैसे पता चला कि बहार कोई भिक्षा माँगने आया है! फिर उसने सोचा कि बुद्ध शायद कई सन्यासियों को इसके पास भिक्षा माँगने भेजा करते होंगे|
थोड़ी देर बाद दरवाज़ा खुला और कमला ने सन्यासी के कटोरे में थोड़ा अनाज डाल दिया| अनाज डालने के बाद कमला ने कहा “तुम इतनी लम्बी यात्रा करके आये हो, थक गए होगे, आओ थोड़ा भोजन यहीं कर लो”|
सन्यासी ने सोचा थक तो मैं गया हूँ सही में, भूख भी काफी लगी है और भोजन करने के लिए यह महिला आमंत्रण दे ही रही है तो ठीक है भोजन कर ही लिया जाए| वह अन्दर आ गया और भोजन के लिए बैठ गया| कमला ने काफी अच्छा भोजन सन्यासी को खिलाया| सन्यासी ने सोचा, मैं तो सोच रहा था कि अभी मैं नया नया सन्यासी हुआ अब तो मेरा जीवन बहुत ही कठिन हो जाएगा, वह सब भोग जो मैं गृहस्थ रहते हुए भोगा करता था अब वो सब छूट जायेंगे और मुझे काफी दमन का जीवन व्यतीत करना पड़ेगा, और यहाँ तो पहले ही दिन अच्छा भोजन मिल गया! सन्यासी भोजन करके काफी खुश हुआ|
भोजन समाप्त होने पर कमला ने सन्यासी को कहा “वहां कोने में चटाई रखी है, थोड़ा आराम कर लो”|
सन्यासी भोजन समाप्त होने पर सोच रहा था, भोजन तो अब हो गया अब वापस भरी धूप में भिक्षा माँगने निकलना पड़ेगा, जब तक गृहस्थ थे तब तक तो भोजन करने के बाद आराम किया करते थे, अब तो यह सब भूल जाना पड़ेगा| सन्यासी के सोचने के दौरान ही कमला द्वारा आराम करने का निमंत्रण पाने पर सन्यासी को काफी अच्छा लगा, उसने सोचा यह तो बहुत ही बढ़िया हो गया| चलो अब थोड़ा आराम भी कर लिया जाए|
आराम करने के बाद जब सन्यासी उठा तो कमला ने कहा “तुम्हारा चाय और नाश्ता तैयार है, वह भी कर लो, फिर भिक्षा मांगने वापस से निकल जाना”|
सन्यासी ने सोचा अब तो हद हो गयी, मैं बस सोच ही रहा था कि जब तक गृहस्थ थे तब तक तो आराम करने के बाद थोड़ा चाय नाश्ता भी हुआ करता था, अब तो यह सब भूल जाना पड़ेगा, दमन का जीवन व्यतीत करना पड़ेगा और इस सोच के दौरान ही मुझे चाय नाश्ते का आमंत्रण दे दिया जाता है! फिर उसने सोचा कि शायद बुद्ध मेरे जैसे कई नए सन्यासियों को कमला के पास भेजा करते होंगे इसलिए ये समझती होगी कि नए सन्यासियों कि क्या क्या आवश्यकताएं रहती हैं| उसने नाश्ता कर लिया और फिर कमला के घर से विदा ली|
वापस आकर सन्यासी ने कमला की बुद्ध के सामने काफी तारीफ की| उसने कहा की कमला ने उसकी काफी खातिरदारी की, वह बहुत ही अच्छी महिला है, उसने उसका काफी ध्यान रखा, केवल भिक्षा ही नहीं दी बल्कि काफी अच्छी मेहमाननवाज़ी भी की| मेरे कुछ मांगने के पहले ही वह मेरे सामने वे चीज़ें लाकर रख देती थी| सन्यासी कमला की बुद्ध के सामने तारीफ करते थका नहीं|
जब सन्यासी ने अपनी बात ख़त्म की तब बुद्ध ने कहा “उस महिला में हर व्यक्ति के विचारों को पढ़ लेने की क्षमता है”, बस इतना ही कह के बुद्ध शांत हो गए|
ये सुनते से ही सन्यासी बुद्ध के सामने से भाग गया| वह तब तक भागता रहा जब तक वह किसी ऐसी जगह पर नहीं आ गया जहाँ उसके आस पास एक भी व्यक्ति नहीं है| यहाँ आकर वह एक पेड़ के नीचे बैठ गया| पेड़ के नीचे बैठ कर वह एक एक कर के अपने उन सारे विचारों को याद करने लगा जो उसके मन में कमला के घर में आये थे| कमला एक बहुत ही सुन्दर महिला थी| कमला को देख कर इस सन्यासी का मन काम वासना से भर गया था| उससे मिलने के बाद, उसके घर में सोते वक़्त, उसको देखते हर वक़्त कामुक विचार और कामुक चित्रण उसका पीछा नहीं छोड़ रहे थे| सन्यासी को लगा कि याने कि कमला ने वो सब भी उसके मन में पढ़ लिया होगा| उसका एक एक कामुक विचार, एक एक कामुक चित्रण का पता कमला को लग गया होगा| यह सोच कर सन्यासी शर्म के मारे पानी पानी हो गया| उसको लग रहा था कि अब वो कैसे कमला से भविष्य में कभी नज़र मिला पायेगा| नज़र मिलाना तो दूर की बात अब वह कैसे कमला के सामने भी कभी आ पायेगा, अब तो वह उस गांव में जाने में भी संकोच करेगा| यह सब विचार सन्यासी का पीछा नहीं छोड़ रहे थे| उसको समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे| कुछ घंटे उसने इसी किंकर्तव्यविमूढ़ता में गुज़ार दिए| अंततः उसने निर्णय लिया कि वह बुद्ध को जा कर के सब कुछ बता देगा और उन्ही से वह समाधान कि अपेक्षा रखेगा|
वह पंहुचा बुद्ध के पास| उसके मन में जो भी था, जो भी भय थे, उसने सब बुद्ध के सामने रख दिए|
बुद्ध ने कहा “इसीलिए तुम्हें उस महिला के पास भेजा था, और मैं चाहता हूँ कि जब तक तुम्हारे अन्दर के सभी भय समाप्त नहीं हो जाएँ तब तक तुम रोज़ उस महिला के पास भिक्षा माँगने जाते रहो”|
यह सुन कर सन्यासी घबरा गया| उसे मन में बहुत डर लगा कि यह वो नहीं कर सकेगा, पर बुद्ध के द्वारा दिए गए निर्देश का वह उल्हंगन भी नहीं कर सकता था| पूरी रात भर उसके दिमाग में यही चलता रहा कि कल वह कैसे उस गाँव में कदम भी रख सकेगा, कैसे वह कमला के सामने अपना मुंह लेजा सकेगा| इन्ही विचारों के साथ वो रात को सोया| घबराहट के कारण ज्यादा सो भी नहीं पाया| सुबह फिर इन्ही विचारों के साथ उठा| अंततः वह वक़्त आ गया जब उसे गांव के लिए वापस से निकलना था|
सन्यासी ने कमला के घर की तरफ बढ़ना चालू किया| उसे पता था की उसके सारे के सारे विचार पढ़ लिए जाने वाले हैं| इसके कारण वह काफी भयभीत भी था| उस भय ने उसे अपने विचारों की ओर काफी गहनता से ध्यान देने के लिए बाध्य किया| अपने विचारों को इस सन्यासी ने काफी गहनता से अध्ययन करना चालू किया| जैसे जैसे सन्यासी के कदम बड़ते जाएँ वैसे वैसे उसके ध्यान की तीव्रता बढती जाए| उसकी उसके विचारों के प्रति सजगता बढती जाए| ध्यान की तीव्रता बढ़ने के क्रम में ध्यान की सूक्ष्मता भी बढ़ती जाए| देखते ही देखते यह सन्यासी विचारों के मूल में जो संस्कार छिपे हुए थे, वहां तक पहुच गया| जैसे जैसे कमला के घर से सन्यासी की दूरी कम होती जाए वैसे वैसे वह स्वयं के भीतर और अधिक सूक्ष्मता में उतरता चला जाये| उसके ध्यान की सूक्ष्मता बढती चली जाए| सूक्ष्म से सूक्ष्म संस्कार भी उसे अब स्पष्ट रूप से दीखते चले जाएँ और उसकी ध्यान की शक्ति से वे जलते चले जाएँ| धीरे धीरे उसके संस्कार जलते चले गए, वह उन संस्कारों से निवृत होता चला गया| धीरे धीरे उसका भय कम होता जा रहा था| धीरे धीरे उसके आग्रह गलने लगे थे| भय और आग्रहों के सारे बीजों से वह धीरे धीरे मुक्त होता जा रहा था| जैसे जैसे दूरियां कम होती जा रही थी वह निर्बीज होता जा रहा था|
और ज्यादा सूक्ष्मता, और ज्यादा खुदाई, और ज्यादा सूक्ष्म संस्कारों का सामना, उनका जलना, और गहरी खुदाई का होना, और यह प्रक्रिया चलती जा रही थी| और फिर यह प्रक्रिया तब तक चलती रही जब तक खोदने को कुछ बाकी ही नहीं रहा, जब तक जलने को कुछ बाकी ही नहीं रहा, जब तक भय के सभी बीज समाप्त नहीं हो गए| अब इस सन्यासी की पात्र खली हो चुका था, वह विचारशून्य हो चुका था, वह समाधिस्त हो चुका था| जब बीज ही नहीं बचा तो अंकुर आएगा किसमें, जब अंकुर ही नहीं आयेंगे तो पौधा बनेगा ही कैसे| इसी तरह अब इस सन्यासी के पट पर कोई विचार रुपी पौधा शेष नहीं रहा| अब यह सन्यासी वह पा चुका था जो पाने वह बुद्ध के पास आया था| वह बुद्धत्व को प्राप्त हो चुका था, वह निर्वाण को प्राप्त हो चुका था| प्रकृति उसके खाली पात्र में वह भर चुकी थी जिसे पाने के लिए अन्य कई भिक्षु प्रतीक्षा में बैठे हुए थे| वह ज्ञान को उपलब्ध हो चुका था|
अंततः वह कमला के घर तक पहुच चुका था| उसमें किसी भी तरह का कोई भय नहीं था| उसने दरवाज़ा खटखटाया| कमला ने दरवाज़े की आवाज़ सुनी, पर इस बार कुछ भी पड़ने को नहीं था! विचार ही नहीं हैं तो पड़े किसे! चित्रण ही नहीं है तो देखें किसे! कमला समझ गयी कि संसार को एक और बुद्ध उपलब्ध हो चुका है| एक और भिक्षु निर्वाण को उपलब्ध हो चुका है| वह घर में अन्दर गयी, थोड़ा अनाज हाथ में लिया, दरवाज़े के पास जाके उसे खोला, सन्यासी के पात्र में अनाज डाला और दरवाज़ा लगा लिया| अब कोई आग्रह सन्यासी में शेष नहीं बचा था तो कमला क्या पूरा करे? तो उसने बस भिक्षा पात्र में डालकर दरवाज़ा लगा लिया| सन्यासी भी पात्र को लेकर चला गया|
देवांश भाई,
क्या चुप हो जाना, विचार-शून्य, संस्कार-शून्य हो जाना “बुद्धत्व” (बोध) है?
क्या बुद्धत्व कोई “रहस्य” है, जिसको शब्दों में नहीं बताया जा सकता, केवल कथा-कहानियों से “उस” की ओर इशारा भर किया जा सकता है?
संस्कार-पूर्णता बुद्धत्व (बोध) है – या संस्कार शून्यता? समाधानित-विचार के साथ समृद्धि पूर्वक जीना बोध होने का प्रमाण है – या विचार शून्यता के साथ घर-बार छोड़ के भीख मांग कर खाना बोध होने का प्रमाण है?
आपका,
राकेश
आदरणीय राकेश जी,
“संस्कार” शब्द को जिस तरह से आप ले रहे हैं और मैंने प्रयोग में लाया है उसमें भिन्नता है| आप समाधान के प्रकाश में एक व्यक्ति में जो स्वीकृतियां होंगी उनको संस्कार कह रहे हैं और मैं समाधान के अभाव में एक व्यक्ति में जो स्वीकृतियां हैं उनको संस्कार कह रहा हूँ| समाधान के अभाव में एक व्यक्ति में जो स्वीकृतियां बनी रहती हैं वो निरंतर आग्रह करती रहती हैं उनके पोषण का| समाधान की ओर प्रयास के क्रम में इन स्वीकृतियों का प्रभाव कम होता चला जाता है, धीरे धीरे ये नष्ट होने लगती हैं| इन्ही को मैंने कहा संस्कारों का जलना| ज्ञान होने तक ये सारे संस्कार जल कर नष्ट हो जाते हैं| इसी स्थिति को कहा निर्बीज हो जाना, निराकर्षित हो जाना|
समाधान के अभाव में विचार की जो एक बाध्यता बनी रहती है, वह ख़त्म हो जाती है ज्ञान होने पर| ज्ञान होने पर जो प्राकृतिक है वही बच गया, अब उसके अनुसार जैसा विचार बनता होगा प्रकृति में वो चलेगा|
संस्कारशून्यता एक स्थिति है जो ज्ञान के या समाधान के क्रम में आएगी ही|
आपका,
देवांश
ठीक है. दो तरह के संस्कार मान लेते हैं – सुसंस्कार और कुसंस्कार.
मुझको लगता है, समाधान के स्थापित होने के लिए – कुसंस्कारों को अपने में से निकालने या अपने चित्त को धोने के आदर्शवादी तपों, प्रायश्चित्त, यज्ञ आदि विधियों की आवश्यकता नहीं है. इनसे पहुंचेंगे नहीं, ऐसा नहीं कहा… लेकिन ये नकारात्मक हैं. इनमे ऐसी मान्यता है, कि “यह नहीं”-“यह नहीं” करते करते हम उस बिंदु पर पहुँच जायेंगे जहां केवल “है” ही बचेगा. हर दिन अपने को दमन करके, नकार के, स्वयं को दोष दे कर ही आदमी इन पर चल पाता है. फिर जब पहुँचता भी है तो भी निर्विचार हो कर भीख ही मांगता हुआ दिखता है. जैसा इस कहानी में भी आपने बताया.
सुसंस्कार स्थापित होते हैं, तो कुसंस्कार अपने आप से निष्प्रभावी हो जाते हैं. या उनके प्रति हमारा आकर्षण कम होता चला जाता है. सही बात को समझने का प्रयास करना सहज है, गलती को अपने में से छांट-छांट कर निकालना मुश्किल है. अभी तक जितना भी अध्ययन कर पाया हूँ, इतना तो मुझसे कहना बन गया है.
जिस तरह का आपने विवरण दिया “नकारात्मक” प्रक्रिया का, मैं उससे असहमत हूँ| इस संवाद की सुविधा के लिए में इस प्रक्रिया को “नकारात्मक” प्रक्रिया कहने के लिए राज़ी हूँ पर यह प्रक्रिया वैसी नहीं है जैसी की आपने ऊपर लिखी| इस प्रक्रिया में दमन नहीं है| यह स्वयं को समझने और स्वीकार करने की प्रक्रिया है|
मेरी अभी तक की यात्रा में मुझे समझ में आया है की सुसंस्कार स्थापित करने जैसी कोई चीज़ नहीं है| बाहरी रूप से स्थापित किया गया संस्कार भी एक मान्यता ही है, हाँ इसे अच्छी मान्यता कहा जा सकता है, पर वह ज्ञान नहीं है| अच्छी मान्यतें भर लेने से गलत मान्यतें चली जायेंगी ऐसा नहीं है – ऐसा मेरा मानना है|
मेरा आपसे कोई आग्रह नहीं है कि आप मेरे विचारों से सहमत हों| मैंने जो कहा वह केवल मेरा मानना/मत है|
ठीक बात है – सुसंस्कार “अच्छी-मान्यता” के रूप में “अपने” अध्यापक/माता-पिता आदि से “अपने” में आते हैं. इनको जीने का अनुकरण-अनुसरण करते हैं, या अभ्यास करते हैं, तो ये अपना स्वत्व हो जाते हैं – ऐसा मैं मानता हूँ. अध्यापक/माता-पिता आदि को “बाहर” के माने तो उनके दिए सुसंस्कार “बाहर” ही रह जाते हैं.
स्वयं को समझना या स्व-निरीक्षण निश्चित-लक्ष्य (समाधान-समृद्धि) के अर्थ में, योग्य मार्ग-दर्शन के साथ ही सफल हो सकता है. वरना अपनी गलतियों को देख-देख कर कुंठित होना और दिशा-हीन हो जाना संभावित रहता है.
आपका,
राकेश.
achchhi lagi kahani… aur charchaa bhi.