हम जानवर हैं या इन्सान?

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जानवर के लिए जीना ही एक मात्र मुद्दा है| जानवर चार आयामों में जीता है, आहार, निद्रा, भय और मैथुन| वह बस खाता पीता है, सोता है, वातावरण की अनुकूलता खोजने में लगा रहता है और अपने वंश को आगे बढाता है| उसके लिए सोचने विचारने के लिए यही ४ मुद्दे हैं| अगर उसका पेट भरा हुआ हो, वातावरण शरीर के लिए अनुकूल हो, आस पास में कोई घातक जानवर न हो तो उसे उससे ज्यादा कुछ की आवश्यकता नहीं रहती| जब उसे भूख लगती है तब वह खाने की तलाश में निकलता है| खाना अगर बहुतायत में उपलब्ध हो तो वह उसकी शरीर की आवश्यकता के अनुसार ग्रहण करता है तथा बाकी वहीँ पर छोड़ देता है| अगर खाना बहुतायत में उपलब्ध नहीं है और खाने वालों की तादात ज्यादा है तो वह छल कपट तथा हिंसा पर भी उतर आता है| अपने शरीर को सुरक्षित रखना, उसको पोषण देना, उसको बाकी जंगली जानवरों से बचाना, उसको वातावरण की अनुकूलता प्रदान करना, यही जानवर के जीने का मूल उद्देश्य है| जानवरों में कुछ हद तक आसपास की चीज़ों को जोड़ पाने की क्षमता या जोड़ कर के देख पाने की क्षमता दिखाई पड़ती है| जानवर में मानने की क्षमता दिखाई पड़ती है|  जैसे एक कुत्ता यह पहचान पाता है कि उसका मालिक कौन है और कौन नहीं है| मालिक के ऊपर वह नहीं भौंकता पर दूसरों पर वह भौंकता है| कुत्ते के सामने आप पत्थर उठाओ तो भागता है| उसमें यह मानने के क्षमता तथा चीज़ों को जोड़ कर देखा पाने की क्षमता कुछ हद तक विकसित रहती है जिसके कारण वह इस तरह की चीज़ों को भी समझ पाता है| जानवर मूलतः घटनाओं के प्रति प्रतिक्रिया ही करता है| घटनाओं के पीछे के नियम को नहीं समझ पाता, फलतः नियमबद्ध होकर नहीं जी पाता तथा उसकी उसे आवश्यकता भी महसूस नहीं होती|

अगर हम इंसान के जीने को देखें तो वह भी जानवर के जीने से बहुत अलग नहीं है| इंसान भी आज इन्ही चार आयामों में ही जी रहा है, आहार, निद्रा, भय और मैथुन| इंसान भी बस खाता पीता है, सोता है, सेक्स करने को लालायित रहता है, वातावरण की अनुकूलता खोजता रहता है, जहाँ अच्छा लगने की अपेक्षा रहती है वहां भागता है, जहाँ अच्छा नहीं लगता वहां से दूर भागता है| जिन लोगों के साथ जब तक अच्छा लगे तब तक उनके साथ में रहता है अच्छा ना लगने पर उनको छोड़ देता है| कुल मिलाकर खाने पीने, सोने, सेक्स करने, पैसा प्रतिष्ठा कमाने और “अच्छा लगने” के पीछे भागने के अलावा कुछ नहीं करता है| उसके जीवन में मुख्य काम वातावरण की अनुकूलता खोजना और उसके पीछे भागना ही रहता है| हम भी घटनाओं के प्रति प्रतिक्रिया ही करते हैं और अधिकतर घटनाओं के पीछे के “क्यों” को, नियम को नहीं समझे रहते|

इंसान में “मानने” की क्षमता तथा घटनाओं को आपस में जोड़कर देख पाने कि क्षमता जानवर से कहीं अधिक विकसित रहती है| इंसान खुद इंसान में, प्रकृति तथा अस्तित्व में होने वाली घटनाओं को जानवर से ज्यादा अच्छा जोड़, तोड़ कर देख पाता है| जैसे वह ये देख पाता है कि बीज को जमीन में डालने पर तथा उचित ताप, दाब, हवा, पानी, मिटटी तथा उर्वरकता उपलब्ध होने पर बीज अंकुरित होना चालू कर देता है तथा उसमें विकास होने लगता है| इस तथ्य तथा इससे जुड़े हुए अनेकों अन्य तथ्यों को वह जोड़कर खेती कर पाने में सक्षम हो पाता है, अपने भोजन का खुद उत्पादन कर पाने में सक्षम हो पाता है| उसी तरह कई सारे प्रयोग कर के वह कई सारी और भी घटनाएं आपस में जोड़ तोड़ पाता है और नई नई चीज़ों का अविष्कार कर लेता है| ऐसी घटनाएं जिन्हें वह आँखों से या इन्द्रियों से नहीं देख पाता वह उन घटनाओं को देखने के लिए कई सारे यंत्रों का निर्माण भी कर लेता है| यंत्रों कि सहायता से वह उन सूक्ष्म घटनाओं को देखकर कई सारी चीज़ों को आपस में जोड़ पाता है| जैसे बिजली का अविष्कार| लोहे के तार के आसपास चुम्बक को घुमाने पर तार में बिजली के प्रवाह को वह देख पाता है| बिजली का दूसरी चीज़ों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है उसे भी वह समझ पाता है और कई दूसरे यंत्रों का निर्माण कर लेता है| यहाँ पर यही समझ में आता है कि इंसान में यह घटनाओं को आपस में जोड़कर देख पाने कि क्षमता जानवर से कहीं कहीं अधिक विकसित है| इन घटनाओं को आपस में जोड़ कर के देख पाने कि क्षमता को उपयोग में लाना और यन्त्र उपकरण बना लेना ही प्रचलित विज्ञानं है|

लोगों से व्यवहार में भी हम अपने ही द्वारा बनाई गई मान्यताओं के आधार पर ही उनके प्रति भावः रखते हैं तथा उस भावः के आधार पर ही उनके साथ व्यवहार करते हैं| जब दूसरे व्यक्ति का व्यवहार हमारी अच्छे के प्रति मान्यताओं की अनुरूपता में होता है तब हम उस पर विश्वास कर पाते हैं तथा सम्मान कर पाते हैं| जो व्यक्ति हमें महत्त्वपूर्ण होने का भावः महसूस करते हैं, मनोवैज्ञानिक रूप से सुरक्षित महसूस करते हैं, आराम पहुचाते हैं हम उन पर विश्वास कर पाते हैं तथा अन्य पर विश्वास नहीं कर पाते| जिन वस्तुओं के आधार पर हम स्वयं महत्त्वपूर्ण महसूस करते हैं या जिन वस्तुओं को हम महत्त्वपूर्ण मानते हैं, जिन लोगों के पास वे वस्तुएं हो उनको सम्मान की नज़र से देखते हैं| यहीं तक सीमित रहती हैं हमारी संबंध, विश्वास तथा सम्मान की समझ| जिन लोगों के साथ में हमें समझे जाने, महत्त्वपूर्ण होने, सुरक्षा का भावः महसूस होता है हम उनकी तरफ आकर्षित होते हैं| जिनके साथ में नहीं होता उनसे प्रत्याकर्षित होते हैं, दूर भागते हैं| जो हमें महत्वहीन महसूस कराते हैं उनके हम विरोधी हो जाते हैं, उनसे हम घृणा का भावः रखते हैं, इर्ष्या उनके प्रति हमारे मन में आ जाती है और हम उनको नीचा दिखाने तथा परेशान करने की योजनायें बनाने लग जाते हैं|

यहाँ पर यही समझ में आता है की अभी इंसान भी घटनाओं के प्रति प्रतिक्रिया ही कर रहा है, वातावरण की अनुकूलता ही खोज रहा है, घटनाओं को आपस में जोड़ कर नयी नयी मान्यताएं ही बना रहा है पर घटनाओं के पीछे के नियमों को, मानव मानव संबंध को, विश्वास को, सम्मान को, प्रेम को अभी नहीं समझ पाया है| उसका जीना भी जानवर से बहुत अलग नहीं है| बल्कि अगर हम ध्यान से देखें तो आज के इंसान का जीना जानवर के जीने से भी बध्तर है| जानवर तो भोजन के कम होने पर ही दूसरे जानवर से छीना झपटी करता है, पर इंसान तो वस्तु के बहुतायत में होने पर भी छल कपट और हिंसा पर उतर आता है| जानवर में यह “और ज्यादा की हाय” दिखाई नहीं पड़ती, जो की इंसान में देखने में आती है| जानवर में यह अपनी पहचान बनाने, महत्त्वपूर्ण होने, पैसे, प्रतिष्ठा के प्रति होड़ दिखाई नहीं पड़ती जो इंसान में नज़र आती है|

एक और अंतर जो इंसान और जानवर में नज़र आता है वह है, जानवर में घटनाओं के मूल में “क्यों” को समझने की क्षमता नहीं है| इंसान में यह “क्यों” को समझ पाने की संभावना उपलब्ध है| इंसान ना सिर्फ घटनाओं को आपस में जोड़ पाता है बल्कि वे घटनाएँ ऐसे ही क्यों हो रही हैं यह समझ सकता है| जैसे, इंसान यह समझ पाता है कि हर इंसान हर क्षण विश्वास तथा सम्मान पूर्वक जीना चाहता है| विश्वास तथा सम्मान पूर्वक जीने कि चाहना इंसान में नित्य बनी रहती है| जब भी इंसान में किसी के भी प्रति अविश्वास का भावः आता है तो वह परेशान होता ही है|  अविश्वास तथा अस्वीकृति का भावः किसी को भी सहज रूप से स्वीकार नहीं होता| यह तथ्य इंसान समझ सकता है तथा प्रमाणित भी कर सकता है|

यहाँ पर यह समझना अत्यंत ही आवश्यक हो जाता है कि इंसान में ऐसा क्या है जो उसे जानवर से अलग बनाता है तथा वह क्या है जो इंसान को विध्वंसकारी क्रियाकलापों में संलग्न होने के लिए प्रेरित करता है?

जानवर के लिए अपने शरीर से जुडी हुई आवश्यकताओं को पूरा करना ही जीने का उद्देश्य बना रहता है| अगर वो पूरी हो रही हों तो उससे ज्यादा की उसे आवश्यकता महसूस नहीं होती| जबकि इंसान के लिए शरीर से जुडी हुई आवश्यकताओं का ही पूरा होना पर्याप्त नहीं होता| इंसान को उससे ज्यादा की आवश्यकता महसूस होती है| जैसे स्वयं में विश्वास तथा सम्मान पूर्वक जीने की चाहना, सुखपूर्वक जीने की चाहना, ज्ञान की चाहना, अपने जीने के हर आयाम में समाधान होने की चाहना, स्वयं में तथा परिवार में समृद्धि होने की चाहना, दूसरे व्यक्ति के साथ परस्परता में विश्वास होने की चाहना, समाज में अभय की चाहना, प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की चाहना|  इंसान में अपनी इस चाहना और इसकी पूर्ती कैसे हो इसकी नासमझी के कारण ही उसकी सारी समस्यायें हैं| स्वयं में स्वयं की नासमझी ही सभी मानव समस्याओं का मूल कारण है| स्वयं की समझ से ही समझ में आता है की मैं क्या चाहता हूँ और किन चीज़ों से वो पूरा होगा| स्वयं में स्वयं की आवश्यकता तथा वह कैसे पूरी हो इस ज्ञान का अभाव ही इंसान को विध्वंसकारी क्रियाकलापों में संलग्न होने के लिए प्रेरित करता है|

अगर हम ध्यान से देखें तो इंसान के दो ही मूल प्रश्न हैं, मैं क्या चाहता हूँ? और वह कैसे पूरा हो?
हर इंसान स्वयं मैं सुख, शांति, संतोष तथा आनंद चाहता है और परिवार मैं समृद्धि, समाज में अभय तथा प्रकृति में सह-अस्तित्व चाहता है| स्वयं में सुख का प्रकाशन ही संबंधों में उभय तृप्ति का आधार बनता है, जिससे ही परस्परता में विश्वास की शुरुआत है| स्वयं में समझदारी तथा परस्परता में विश्वास का ही प्रकाशन समाज में अभय और समाज में अभय का ही प्रकाशन है प्रकृति में सह-अस्तित्व| यहाँ से यही समझ में आता है की सभी मानव समस्याओं का मूल कारण इंसान में समझदारी का अभाव ही है| इंसान में समझदारी ही उसके खुद के सुख का भी आधार है| स्वयं में ज्ञान, समाधान ही स्वयं में सुख है| ज्ञान का अर्थ है स्वयं में स्वयं, अस्तित्व तथा इंसान की अस्तित्व में भागीदारी का ज्ञान|

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