सज्जन आदमी (A Modest Man!)…

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मन में एक चोर छिपा बैठा है और
वह कहता है की वह सज्जन आदमी है,
हर क्षण मन में वह किसी की हत्या किया करता है और
वह कहता है की वह सज्जन आदमी है!

समाज के भय से अपने असल स्वरुप को,
वह ज़माने की नज़रों से छिपाए रखता है,
जाने कितनो का अपने ख्यालों में बलात्कार किया करता है,
वह कहता है की वह सज्जन आदमी है!

अपने गुस्से को मन में ही दबाकर वह,
मानता है की मैं क्रोध को जीत चुका हूँ,
अपने ही अन्दर ही घुट घुट कर जिया करता है,
वह कहता है की वह सज्जन आदमी है!

एक सीमा तक सज्जनता को ढोता है,
और घुटन सहन ना होने पर फ़ेंक देता है मुखौटा,
हर क्षण ख़ुद ही को धोखा दिया करता है,
वह कहता है की वह सज्जन आदमी है!

ख़ुद भी एक चूहा बनकर वह सज्जन,
दूसरे चूहों से निरंतर आगे रहने का चित्रण किया करता है,
भागना बुरा है साथ ही यह भी कहा करता है,
वह कहता है की वह सज्जन आदमी है!

स्वयं को सही मानकर वह सज्जन,
पूरी दुनिया को गाली गलौच किया करता है,
साथ ही मानवीयता का गुणगान भी किया करता है,
वह कहता है की वह सज्जन आदमी है!

सबीज होते हुए भी वह सज्जन आदमी,
निर्बीज होने का दावा किया करता है,
अनुकूल वातावरण के मिलते ही वह अंकुरित हो जाया करता है,
वह कहता है की वह सज्जन आदमी है!

सापेक्षता में जी कर भी वह सज्जन आदमी,
निरपेक्षता के दावे किया करता है|
अपनी परतंत्रता से अंजान हो कर वह,
स्वतंत्रता के गीत गाया करता है,
वह कहता है की वह सज्जन आदमी है!

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